कानूनी

उत्तराखंड उपभोक्ता आयोग का आदेश: LIC खारिज डेथ क्लेम के 2 लाख रुपये चुकाए

उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने माना कि LIC ने पुराने हेपेटाइटिस इलाज की जानकारी न देने के आधार पर एक विधवा के क्लेम गलत तरीके से खारिज किए और ब्याज सहित 2 लाख रुपये देने का आदेश दिया।

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आधिकारिक स्रोतConsumer commission
कानूनी / 24 अक्टूबर 2026

उत्तराखंड राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने Life Insurance Corporation of India (LIC) को एक विधवा को 2 लाख रुपये चुकाने का आदेश दिया है, जिसके दो पॉलिसियों के डेथ क्लेम LIC ने खारिज कर दिए थे। 16 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए आदेश में आयोग ने कहा कि LIC यह साबित नहीं कर पाई कि पॉलिसीधारक का पुराना हेपेटाइटिस इलाज ऐसा अहम तथ्य था, जिसके आधार पर क्लेम खारिज करना उचित हो।

क्या हुआ

पॉलिसीधारक ने 1-1 लाख रुपये की बीमा राशि वाली LIC की दो पॉलिसियां ली थीं, जिनमें पत्नी और बेटे को नॉमिनी बनाया गया था। पॉलिसी लेने के कुछ ही महीनों बाद मई 2012 में उनका निधन हो गया। LIC ने जून 2013 में दोनों क्लेम यह कहते हुए खारिज कर दिए कि उन्होंने अगस्त और सितंबर 2011 में हुए हेपेटाइटिस के इलाज की जानकारी नहीं दी थी। जिला फोरम ने 2016 में विधवा की शिकायत खारिज कर दी, जिसके बाद उन्होंने अपील की।

आयोग ने पाया कि इलाज करने वाले डॉक्टर ने प्रमाणित किया था कि इलाज के बाद उनकी हालत सुधर गई थी, सितंबर 2011 की पैथोलॉजी रिपोर्ट में बिलिरुबिन सामान्य था, और LIC के अपने पैनल डॉक्टर ने मौत का कारण दिल से जुड़ा बताया था और किसी अन्य बीमारी का ज़िक्र नहीं किया था। आदेश के अनुसार, किसी भी मेडिकल राय ने पुराने हेपेटाइटिस को मौत से नहीं जोड़ा।

आयोग ने कहा कि बीमा में अहम तथ्यों का पूरा खुलासा ज़रूरी है, लेकिन हर चूक क्लेम खारिज करने का आधार नहीं बनती। बीमा कंपनी को दिखाना होगा कि छिपाया गया तथ्य जोखिम स्वीकार करने के उसके फैसले के लिए मायने रखता था। सुप्रीम कोर्ट के एक फैसले के आधार पर आयोग ने पाया कि LIC ऐसा नहीं कर सकी। आयोग ने जिला फोरम का आदेश रद्द कर शिकायत स्वीकार कर ली।

इसका क्या मतलब है

LIC को आदेश के एक महीने के भीतर 2 लाख रुपये, शिकायत दर्ज होने की तारीख 24 मार्च 2014 से भुगतान तक 6% सालाना ब्याज, और 10,000 रुपये मुकदमे का खर्च देना होगा। इस आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है।

पॉलिसीधारकों के परिवारों के लिए यह फैसला बताता है कि पुरानी बीमारी छिपाने के आधार पर क्लेम खारिज करने वाली बीमा कंपनी को यह साबित करना होगा कि वह बीमारी जोखिम के लिए अहम थी, सिर्फ यह नहीं कि बीमारी थी। ऐसे आधार पर क्लेम खारिज होने पर परिवार National Consumer Helpline (1915) से मदद ले सकते हैं या e-Daakhil पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

स्रोत: Consumer commission order

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।