कानूनी

Concast Steel and Power से जुड़े ED मामले में सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य आरोपी को दी ज़मानत

सुप्रीम कोर्ट ने Concast Steel and Power से जुड़े ED के मनी लॉन्ड्रिंग मामले के मुख्य आरोपी को ज़मानत दी है। अदालत ने कहा कि जल्द सुनवाई की संभावना न होने पर लंबी हिरासत रिहाई का आधार है।

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आधिकारिक स्रोतSupreme Court of India
कानूनी / 16 अक्टूबर 2026

सुप्रीम कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को Concast Steel and Power Limited से जुड़े प्रवर्तन निदेशालय (ED) के मनी लॉन्ड्रिंग मामले के मुख्य आरोपी को ज़मानत दे दी। ED के अनुसार इस मामले में अपराध की कमाई 6,210.72 करोड़ रुपये है। अदालत ने कहा कि लगभग 20 महीने से हिरासत में रहे अपीलकर्ता को लंबी सुनवाई लंबित रहने तक जेल में रखने की ज़रूरत नहीं है। अदालत ने गिरफ्तारी को अवैध बताने वाली उनकी दलील खारिज कर दी।

क्या हुआ

अपीलकर्ता ने कलकत्ता हाई कोर्ट के 14 नवंबर 2025 के उस आदेश को चुनौती दी थी, जिसमें उन्हें नियमित ज़मानत देने से इनकार किया गया था। मार्च 2023 में दर्ज ED का मामला सितंबर 2022 की CBI FIR के बाद आया।

ED के अनुसार, अपीलकर्ता ने State Bank of India के नेतृत्व वाले बैंकों के समूह से कर्ज़ लेने के लिए कंपनी का टर्नओवर बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया और 62 शेल कंपनियों के ज़रिए पैसा इधर-उधर किया। ED ने कहा कि अब तक केवल 777.10 करोड़ रुपये की संपत्ति कुर्क हुई है। उन्हें दिसंबर 2024 में गिरफ्तार किया गया था।

अपीलकर्ता की दलील थी कि ED ने गिरफ्तारी आदेश और सामग्री न्यायनिर्णायक प्राधिकरण (Adjudicating Authority) को भेजने में पांच दिन की देरी की, इसलिए गिरफ्तारी अवैध है। अदालत इससे सहमत नहीं हुई और कहा कि कानून में यह काम "तुरंत" करने की बात है, जिसका मतलब कोई तय समय-सीमा नहीं है।

लेकिन अदालत ने माना कि मामले के आकार को देखते हुए जल्द सुनवाई पूरी होना असंभव है। ED की तीन शिकायतों में 97 आरोपी हैं, और अदालत ने हज़ारों पन्नों के दस्तावेज़ों और लगभग 98 गवाहों का ज़िक्र किया। अपीलकर्ता के बारे में जांच पूरी हो चुकी है, और PMLA के तहत अधिकतम सज़ा सात साल है। अदालत ने कहा कि PMLA की ज़मानत की सख्त शर्तें संविधान के Article 21 के तहत जीवन और स्वतंत्रता के अधिकार से ऊपर नहीं हो सकतीं, और प्रक्रिया अपने आप में सज़ा नहीं बननी चाहिए।

अदालत ने निचली अदालत द्वारा तय शर्तों पर ज़मानत का आदेश दिया, पासपोर्ट जमा करने और बिना अनुमति देश न छोड़ने या गवाहों को प्रभावित न करने का निर्देश दिया।

ये आरोप हैं, दोष के निष्कर्ष नहीं; अदालत में दोष साबित होने तक आरोपियों को निर्दोष माना जाता है, और कानूनी प्रक्रिया जारी है।

इसका क्या मतलब है

इस फैसले के मुताबिक, जल्द सुनवाई की संभावना न होने पर लंबी हिरासत PMLA की सख्त शर्तों के बावजूद ज़मानत का आधार बन सकती है। अदालत ने कहा कि उसकी टिप्पणियां मामले के गुण-दोष पर निष्कर्ष नहीं हैं, इसलिए SBI के नेतृत्व वाले बैंक समूह से लिए गए कर्ज़ से जुड़ा मामला निचली अदालत में जारी रहेगा।

स्रोत: Supreme Court judgment

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