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कंपनी मामले

Kotak Mahindra Bank के 18.92 करोड़ रुपये के दावे पर NCLT ने Richesm Healthcare को दिवाला प्रक्रिया में भेजा

NCLT की इलाहाबाद पीठ ने Kotak Mahindra Bank की याचिका पर नोएडा की Richesm Healthcare Limited को 18.92 करोड़ रुपये के डिफॉल्ट के मामले में दिवाला प्रक्रिया में भेज दिया है।

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आधिकारिक स्रोतNational Company Law Tribunal
Richesm Healthcare insolvency timeline: Kotak Mahindra Bank sanctioned Rs 20 crore of loans on 11 February 2025, recalled them on 3 July 2025, classified the account a non-performing asset on 7 July 2025 and petitioned on 29 August 2025; the NCLT admitted the company on 26 October 2026, next listing 30 November 2026.
ओक्विलिया ग्राफ़िक। स्रोत: NCLT Allahabad bench order, 26 October 2026

राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) की इलाहाबाद पीठ ने Kotak Mahindra Bank की याचिका पर नोएडा स्थित Richesm Healthcare Limited के खिलाफ कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया शुरू करने का आदेश दिया है। 26 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए आदेश में बैंक का 18,92,17,474.96 रुपये के डिफॉल्ट का दावा दर्ज है, जिसमें 18,35,88,444.58 रुपये मूलधन और 56,29,030.38 रुपये ब्याज है।

क्या हुआ

आदेश के अनुसार, बैंक ने 11 फरवरी 2025 के पत्र से कंपनी को 12 करोड़ रुपये का टर्म लोन और 8 करोड़ रुपये की कैश क्रेडिट सीमा, कुल 20 करोड़ रुपये, मंजूर किए थे। बैंक ने कहा कि कंपनी भुगतान नहीं कर पाई, उसने 3 जुलाई 2025 के नोटिस से कर्ज वापस मांगा और 7 जुलाई 2025 को खाते को गैर-निष्पादित परिसंपत्ति (NPA) घोषित किया। याचिका में यही डिफॉल्ट की तारीख है, और याचिका 29 अगस्त 2025 को दायर हुई थी।

आदेश में दर्ज है कि 9 जुलाई 2025 को अपने वकील के जरिये भेजे पत्र में कंपनी ने कहा था कि "अपरिहार्य परिस्थितियों" के कारण वह किस्तें समय पर नहीं चुका सकी और छह महीने में भुगतान कर देगी। बैंक ने जवाब दिया कि कोई भुगतान योजना या वित्तीय क्षमता का सबूत नहीं दिया गया।

कंपनी की दलील थी कि बैंक ने कर्ज के गारंटर के तौर पर उसके निलंबित निदेशक के खिलाफ पहले ही व्यक्तिगत दिवाला याचिका दायर की है, जिससे अंतरिम मोरेटोरियम लागू है, इसलिए यह याचिका आगे नहीं बढ़ सकती। न्यायाधिकरण ने कहा कि वह मोरेटोरियम केवल गारंटर के कर्जों पर लागू होता है, कंपनी के खिलाफ दिवाला कार्यवाही पर रोक नहीं लगाता। उसने दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की धारा 7 की शर्तें पूरी पाईं।

इसका क्या मतलब है

न्यायाधिकरण द्वारा नियुक्त अंतरिम समाधान पेशेवर अब कंपनी चलाएगा और उसे तुरंत सार्वजनिक घोषणा करके दावे मंगाने होंगे। लेनदार उस घोषणा के निर्देशों के अनुसार अपने दावे दाखिल करें। प्रक्रिया के दौरान मोरेटोरियम के चलते मुकदमों, वसूली और कंपनी की संपत्ति बेचने पर रोक रहेगी, और बैंक को शुरुआती खर्च के लिए 1 लाख रुपये जमा करने होंगे। मामले की अगली सुनवाई 30 नवंबर 2026 को है।

दिवाला प्रक्रिया में भेजा जाना धोखाधड़ी या कुप्रबंधन का निष्कर्ष नहीं है। NCLT के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में अपील की जा सकती है।

स्रोत: NCLT order

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।