कानूनी
मद्रास हाई कोर्ट ने SBI के कब्जा आदेश के खिलाफ कर्जदार की रिट खारिज की, DRT जाने को कहा
मद्रास हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को State Bank of India द्वारा हासिल SARFAESI कब्जा आदेश के खिलाफ एक कर्जदार की रिट याचिका खारिज कर दी और कहा कि उपाय ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) के पास है।
मद्रास हाई कोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को एक कर्जदार की वह रिट याचिका खारिज कर दी, जो State Bank of India द्वारा SARFAESI Act के तहत हासिल कब्जा आदेश के खिलाफ दायर की गई थी। SARFAESI Act वह कानून है जिसके तहत बैंक कर्ज के बदले रखी गई जमानत को लागू करते हैं। मुख्य न्यायाधीश की अध्यक्षता वाली पीठ ने कहा कि कर्जदार का उपाय ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) के पास है, हाई कोर्ट में रिट याचिका के जरिए नहीं।
क्या हुआ
कर्जदार ने चीफ मेट्रोपॉलिटन मजिस्ट्रेट, एग्मोर, चेन्नई द्वारा SARFAESI Act की Section 14 के तहत 18 फरवरी 2026 को पारित आदेश को चुनौती दी थी। याचिका में Act की Section 13 और 14 के तहत चल रही सभी जुड़ी कार्यवाहियों को रद्द करने और बैंक को कर्जदार की संपत्ति पर कब्जा लेने से रोकने की मांग भी की गई थी।
कोर्ट ने Phoenix ARC (P) Ltd. v. Vishwa Bharati Vidya Mandir मामले में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला दिया, जिसमें कहा गया था कि Section 14 के आदेश के खिलाफ उपाय Act की Section 17 के तहत DRT के सामने है और रिट याचिका सुनवाई योग्य नहीं है। कोर्ट द्वारा उद्धृत अंश में सुप्रीम कोर्ट की यह राय दर्ज है कि Section 17 के तहत अपील का उपाय तेज और प्रभावी दोनों है। उसमें यह भी कहा गया है कि जहां प्रभावी उपाय मौजूद हो, वहां हाई कोर्ट को आम तौर पर रिट याचिका पर सुनवाई नहीं करनी चाहिए, और बैंकों व वित्तीय संस्थानों के बकाये की वसूली के मामलों में यह नियम और सख्ती से लागू होता है।
इसी कानून के आधार पर कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और कर्जदार के लिए उचित मंच पर अपने अधिकारों के लिए आगे बढ़ने का रास्ता खुला छोड़ा। कोई खर्च नहीं लगाया गया और जुड़ी हुई विविध याचिकाएं बंद कर दी गईं।
इसका क्या मतलब है
जिन कर्जदारों की गिरवी संपत्ति पर SARFAESI Act की Section 14 के तहत कब्जा आदेश है, उनके लिए यह फैसला याद दिलाता है कि हाई कोर्ट आम तौर पर सीधे रिट याचिका सुनने के बजाय उन्हें Section 17 के तहत DRT के पास भेजेगा। जिस सुप्रीम कोर्ट फैसले पर भरोसा किया गया, उसमें यह भी कहा गया है कि बैंकों, वित्तीय संस्थानों और सुरक्षित लेनदारों के बकाये की वसूली के मामलों में रोक लगाते समय हाई कोर्ट को बेहद सावधान रहना चाहिए।
यह आदेश यह तय नहीं करता कि तथ्यों के आधार पर बैंक की कार्रवाई सही थी या गलत। यह सिर्फ मंच तय करता है और कर्जदार को उचित प्राधिकरण के सामने अपने अधिकारों के लिए आगे बढ़ने की छूट देता है।
स्रोत: High Court judgment
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