कानूनी
कर्नाटक हाई कोर्ट ने Kingfisher मामले में UBL शेयरों पर बैंकों का दावा खारिज किया
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को Diageo Holdings Netherlands की याचिकाएं मंजूर करते हुए ऋण वसूली न्यायाधिकरण और वसूली अधिकारी के आदेश रद्द कर दिए और कहा कि UBL शेयरों पर बैंकों के दावे का कोई औचित्य नहीं है।
कर्नाटक हाई कोर्ट ने 14 अक्टूबर 2026 को Diageo Holdings Netherlands B.V. की ओर से State Bank of India और अन्य बैंकों के खिलाफ दायर दो रिट याचिकाएं मंजूर कर लीं और उनमें चुनौती दिए गए आदेश रद्द कर दिए। अदालत ने कहा कि बैंकों के समूह (कंसोर्शियम) के पास UBL शेयरों पर दावे का कोई औचित्य नहीं है, क्योंकि अब बंद हो चुकी Kingfisher Airlines Ltd को दिए गए 6,203 करोड़ रुपये के कर्ज के बदले बैंकों को पहले ही 14,131.6 करोड़ रुपये की संपत्ति लौटाई जा चुकी है।
क्या हुआ
याचिकाओं में चेन्नई स्थित ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) के 9 अक्टूबर 2018 के आदेश और कर्नाटक के ऋण वसूली न्यायाधिकरण-2 (DRT) के वसूली अधिकारी-I के 3 जून 2017 के आदेश को चुनौती दी गई थी। ऋण वसूली न्यायाधिकरण बैंकों के वसूली मामलों का फैसला करते हैं और DRAT उनके फैसलों के खिलाफ अपील सुनता है।
दो जजों की पीठ ने कहा कि एक मौखिक आश्वासन Facility Agreement, Share Pledge Agreement और Backstop Guarantee Agreement पर भारी नहीं पड़ सकता। ये समझौते 3 सितंबर 2013 को Kingfisher Airlines, UBL और प्रमोटर के खिलाफ हाई कोर्ट की अंतरिम रोक से पहले ही हो चुके थे। अदालत ने यह भी कहा कि बैंकों के साथ समझौते के तहत प्रमोटर की निजी गारंटी उन 1,04,64,288 UBL शेयरों पर लागू नहीं होती, जो उनके पास एक अन्य व्यक्ति के साथ संयुक्त रूप से थे। वह व्यक्ति उस समझौते का पक्षकार नहीं था और उसने कोई गारंटी नहीं दी थी। अदालत के अनुसार, कोई सह-मालिक दूसरे मालिक की स्पष्ट सहमति के बिना संयुक्त संपत्ति को गिरवी नहीं रख सकता।
अदालत ने दर्ज किया कि बैंकों ने DRT के सामने कभी यह नहीं कहा था कि याचिकाकर्ता प्रमोटर के समूह का हिस्सा है, और इस बारे में DRAT की टिप्पणी को रिकॉर्ड के विपरीत पाया। अदालत ने माना कि Standard Chartered Bank और याचिकाकर्ता से जुड़े लेनदेन वास्तविक व्यावसायिक लेनदेन थे।
इसका क्या मतलब है
यह फैसला सुप्रीम कोर्ट के उन फैसलों के सिद्धांतों को दोहराता है जिन पर अदालत ने भरोसा किया। किसी संपत्ति को न बेचने का सिर्फ वादा करने से उस पर कोई चार्ज, यानी कानूनी दावा, नहीं बनता, जब तक कि टाइटल डीड जमा करके या पंजीकृत दस्तावेज के जरिए चार्ज न बनाया जाए। गारंटी देने वाले पर निजी जिम्मेदारी बनती है; अदालत ने कहा कि गारंटर की जिम्मेदारी कर्जदार के बराबर होती है, इसलिए बैंक दोनों में से किसी से भी वसूली कर सकता है। लेकिन गारंटी अपने आप में बैंक को उस संपत्ति पर अधिकार नहीं देती जो गारंटर किसी और के साथ संयुक्त रूप से रखता है।
अदालत ने यह भी कहा कि अब तक हुई वसूली को देखते हुए इन कार्यवाहियों को खत्म करना बैंकों के समूह और भारत सरकार का काम है।
स्रोत: High Court judgment
यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।