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कर्नाटक हाईकोर्ट ने डिफॉल्टर नोटिस पर SBI के खिलाफ मानहानि केस जारी रखा

कर्नाटक हाईकोर्ट ने अखबार में छपे उस नोटिस पर SBI और उसके एक अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मानहानि केस रद्द करने से इनकार कर दिया, जिसमें शिकायतकर्ता के आरोप के अनुसार उसे गलत तरीके से डिफॉल्टर बताया गया।

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आधिकारिक स्रोतKarnataka High Court
Red columned portico of the Karnataka High Court

फ़ोटो: Polytropos-Commons / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0 (क्रॉप की गई)। फ़ाइल फ़ोटो।

कर्नाटक हाईकोर्ट ने 27 October 2026 को भारतीय स्टेट बैंक (SBI) और उसके अधिकृत अधिकारी के खिलाफ आपराधिक मानहानि का केस रद्द करने से इनकार कर दिया। शिकायतकर्ता का आरोप है कि अखबार में छपे एक नोटिस में उसे गलत तरीके से कर्ज का डिफॉल्टर बताया गया। कोर्ट ने SBI के तत्कालीन चेयरमैन और एक डिप्टी जनरल मैनेजर के खिलाफ केस रद्द कर दिया, लेकिन बैंक और नोटिस छपवाने वाले अधिकारी के खिलाफ केस जारी रहेगा।

क्या हुआ

शिकायतकर्ता Bharath Infra Exports and Imports Ltd के पूर्व होल-टाइम डायरेक्टर हैं। उनका कहना है कि उन्होंने 17 October 2016 को डायरेक्टर पद से इस्तीफा दे दिया था और SBI तथा रजिस्ट्रार ऑफ कंपनीज, दोनों को इसकी जानकारी दी थी। शिकायत के अनुसार, SBI ने 4 November 2018 को SARFAESI Act के तहत, यानी वह कानून जिससे बैंक कर्ज के बदले गिरवी रखी संपत्ति अपने कब्जे में ले सकते हैं, अखबारों में कब्जा नोटिस छपवाया और उसमें उन्हें डिफॉल्टर बताया, जबकि वे इस्तीफा दे चुके थे और उनके अनुसार गारंटर भी नहीं थे। उनका आरोप है कि 22 November 2018 के कानूनी नोटिस के बाद भी बैंक ने नोटिस वापस नहीं लिया।

बेंगलुरु के एक मजिस्ट्रेट ने 16 January 2019 को मानहानि के मामले में प्रक्रिया जारी की। बैंक की दलील थी कि विवाद दीवानी है, वसूली की कार्यवाही डेट रिकवरी ट्रिब्यूनल में लंबित है और SARFAESI Act की Section 32 उसके अधिकारियों को सुरक्षा देती है।

कोर्ट ने कहा कि Section 32 केवल नेकनीयती से किए गए काम को सुरक्षा देती है, और शिकायत को जस का तस मानें तो बैंक और अधिकृत अधिकारी के खिलाफ प्रथम दृष्टया मामला बनता है। चेयरमैन और डिप्टी जनरल मैनेजर की निजी भूमिका का कोई खास आरोप नहीं मिला, लेकिन कोर्ट ने कहा कि सामग्री सामने आने पर उन्हें बाद में आरोपी बनाया जा सकता है।

इसका क्या मतलब है

यह फैसला इस बात का निष्कर्ष नहीं है कि SBI ने किसी की मानहानि की। शिकायतकर्ता गारंटर थे या नहीं, और नोटिस नेकनीयती से छपा या नहीं, यह ट्रायल में तय होगा। ये आरोप हैं, दोष के निष्कर्ष नहीं; अदालत में दोष साबित होने तक आरोपी निर्दोष माने जाते हैं, और कानूनी प्रक्रिया जारी है।

कर्जदारों और पूर्व डायरेक्टरों के लिए यह फैसला दिखाता है कि SARFAESI Act में बैंक अधिकारियों को मिली सुरक्षा केवल नेकनीयती से किए गए काम तक है। बैंक की सेवा से जुड़ी शिकायत RBI के पोर्टल https://cms.rbi.org.in पर की जा सकती है।

स्रोत: High Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।