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झारखंड हाई कोर्ट ने तीन परीक्षकों के खिलाफ 1992 का रिश्वत मामला रद्द करने से इनकार किया

झारखंड हाई कोर्ट ने 1992 का वह मामला रद्द करने से इनकार कर दिया जिसमें पॉलिटेक्निक के तीन परीक्षकों पर रिश्वत लेने का आरोप है, पर 2018 के संशोधित कानून के तहत तय आरोप रद्द कर दिया।

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आधिकारिक स्रोतJharkhand High Court
Timeline of the case: FIR on 7 Jun 1992, chargesheet on 25 Apr 2000, cognizance on 27 Sep 2023, charge under the 2018 amended law on 4 Dec 2024, set aside by the High Court on 3 Nov 2026, with an appearance due on 1 Dec 2026.
ओक्विलिया ग्राफ़िक। स्रोत: Jharkhand High Court judgment, 3 November 2026

झारखंड हाई कोर्ट ने 3 नवंबर 2026 को बदरी नारायण लाल, महेंद्र प्रसाद सिंह और शिव दहिन प्रसाद सिंह के खिलाफ 1992 के रिश्वत मामले को रद्द करने से इनकार कर दिया। उन पर आरोप है कि गवर्नमेंट पॉलिटेक्निक, आदित्यपुर में पॉलिटेक्निक परीक्षा की उत्तर पुस्तिकाएं जांचते समय लोक सेवक के रूप में उन्होंने अवैध रिश्वत ली। कोर्ट ने संशोधित भ्रष्टाचार निरोधक कानून के तहत तय किया गया आरोप रद्द कर दिया और मामला नए सिरे से आरोप तय करने के लिए ट्रायल कोर्ट को वापस भेज दिया।

क्या हुआ

फैसले में उद्धृत आरोप के अनुसार, तीनों पर 6 जून 1992 के आसपास उत्तर पुस्तिकाएं जांचने के बदले रिश्वत लेने का आरोप है। 7 जून 1992 को FIR दर्ज हुई, विजिलेंस पुलिस ने 25 अप्रैल 2000 को चार्जशीट दाखिल की और स्पेशल जज (ACB), पश्चिमी सिंहभूम, चाईबासा ने 27 सितंबर 2023 को संज्ञान लिया। 4 दिसंबर 2024 को ट्रायल कोर्ट ने 2018 में संशोधित भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की Section 7(a) के तहत आरोप तय किया।

78 से 84 साल की उम्र के तीनों की दलील थी कि संज्ञान निरस्त हो चुके प्रावधानों के तहत लिया गया और 30 साल से ज्यादा की देरी ने उनके त्वरित सुनवाई के अधिकार का उल्लंघन किया।

हाई कोर्ट ने कहा कि संज्ञान आदेश में निरस्त प्रावधानों का जिक्र एक अनियमितता है, जिससे कोई नुकसान नहीं हुआ, और सभी 11 आरोपियों पर मुकदमा चलाने की मंजूरी रिकॉर्ड पर है। लेकिन कोर्ट ने कहा कि कथित अपराध उस समय का है जब भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 लागू था, इसलिए 2018 के संशोधित कानून के तहत आरोप "टिक नहीं सकता"। कोर्ट ने देरी के आधार पर मामला रद्द करने की मांग खारिज कर दी और कहा कि आरोप गंभीर हैं और आरोपी पूरे समय जमानत पर रहे।

ये आरोप हैं, दोष का निष्कर्ष नहीं; अदालत में दोष साबित होने तक आरोपी निर्दोष माने जाते हैं और कानूनी प्रक्रिया जारी है।

इसका क्या मतलब है

मुकदमा जारी रहेगा। ट्रायल कोर्ट को 1988 के कानून के तहत आरोप पर नया आदेश पारित करना होगा, और तीनों को 1 दिसंबर 2026 को उसके सामने पेश होना होगा। हाई कोर्ट ने पक्षों से सहयोग करने को कहा ताकि 1992 की FIR से जुड़ा यह मामला जल्द से जल्द खत्म हो।

किसी अधिकारी द्वारा रिश्वत मांगने की शिकायत राज्य के एंटी-करप्शन ब्यूरो में की जा सकती है; हर राज्य की हेल्पलाइन के लिए Oquilia की गाइड https://www.oquilia.com/report-a-bribe पर है।

स्रोत: High Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।