टैक्स
ITAT राजकोट: पंजीकरण खारिज होने पर भी ट्रस्ट को खर्च की कटौती मिलनी चाहिए
ITAT राजकोट बेंच ने कहा कि जिस कच्छ के ट्रस्ट का पंजीकरण खारिज हुआ, उसके पूरे 20,36,678 रुपये के दान पर टैक्स नहीं लगाया जा सकता और अधिकारी को खर्च मंजूर करने का निर्देश दिया।
आयकर अपीलीय अधिकरण (ITAT) की राजकोट बेंच ने 29 अक्टूबर 2026 को कहा कि जिस ट्रस्ट का चैरिटेबल पंजीकरण खारिज हो गया हो, उसे भी वास्तव में खर्च की गई रकम की कटौती मिलनी चाहिए और उसकी कुल प्राप्तियों पर टैक्स नहीं लगाया जा सकता। अधिकरण ने टैक्स अधिकारी को निर्देश दिया कि वह गुजरात के कच्छ स्थित जीवदया सेवा ट्रस्ट, पालनसवा के आकलन वर्ष 2022-23 के खर्च मंजूर करे।
क्या हुआ
आदेश के अनुसार, ट्रस्ट ने 27 सितंबर 2022 को शून्य आय दिखाते हुए रिटर्न दाखिल किया था। उसे पर्यावरण संरक्षण के लिए 20,36,678 रुपये दान में मिले थे। उसका मामला जांच के लिए चुना गया और ट्रस्ट के रूप में पंजीकरण का उसका आवेदन (Form 10AB) खारिज कर दिया गया।
आकलन अधिकारी ने कहा कि ट्रस्ट इन फंड्स के दस्तावेजी सबूत नहीं दे सका, उसे टैक्स के लिहाज से ट्रस्ट नहीं माना और पर्यावरण संरक्षण पर हुए खर्च को मंजूरी नहीं दी। अधिकारी ने पूरे 20,36,678 रुपये उसकी आय में जोड़ दिए और व्यक्तियों के संघ (AOP) के रूप में टैक्स लगाया। आयकर आयुक्त (अपील) ने इसे सही ठहराया।
अधिकरण इससे सहमत नहीं हुआ। दिल्ली हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के आधार पर उसने कहा कि जब किसी संस्था को चैरिटेबल पंजीकरण नहीं मिलता, तब भी आयकर अधिनियम के सामान्य प्रावधानों के तहत उसके वास्तविक खर्च मंजूर होने चाहिए, क्योंकि ऐसा न करने का मतलब कुल प्राप्तियों पर टैक्स लगाना होगा, जो कानून के खिलाफ है। अधिकरण ने पाया कि ट्रस्ट ने खर्च के समर्थन में दस्तावेज दिए थे, अधिकारी ने उनका कभी खंडन नहीं किया, और बिना ठोस कारण बताए या खाता-बही खारिज किए खर्च नामंजूर कर दिए। उसने अधिकारी को निर्देश दिया कि खर्च को "ऐसे मंजूर करें मानो करदाता कारोबार चला रहा हो" और सामान्य दर लागू करे, और अपील स्वीकार कर ली।
इसका क्या मतलब है
जिन ट्रस्टों और धर्मार्थ संस्थाओं का आयकर अधिनियम के तहत पंजीकरण नामंजूर या रद्द हो जाता है, उनके लिए यह आदेश कहता है कि उनका खर्च टैक्स की गणना से गायब नहीं हो जाता: वास्तविक और दस्तावेजों से समर्थित खर्च घटाने के बाद ही आय पर टैक्स लगता है। यह इस मामले में अधिकरण का फैसला है।
स्रोत: ITAT order
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