कानूनी
दिल्ली उपभोक्ता आयोग ने एंबुलेंस में चूक पर मेट्रो हॉस्पिटल को 15 लाख रुपये देने का आदेश दिया
दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने स्ट्रोक के मरीज के लिए लाइफ-सपोर्ट एंबुलेंस की व्यवस्था न करने पर मेट्रो हॉस्पिटल एंड हार्ट इंस्टीट्यूट को सेवा में कमी का जिम्मेदार ठहराया।
दिल्ली राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने नई दिल्ली के लाजपत नगर स्थित मेट्रो हॉस्पिटल एंड हार्ट इंस्टीट्यूट को एक मरीज के परिवार को 15 लाख रुपये मुआवजा देने का आदेश दिया है। 6 नवंबर 2026 के अपने फैसले में आयोग ने कहा कि नवंबर 2013 में स्ट्रोक के बाद मरीज को दूसरे अस्पताल ले जाते समय अस्पताल लाइफ-सपोर्ट एंबुलेंस और साथ जाने वाले डॉक्टर की व्यवस्था करने में विफल रहा। आयोग ने मुकदमे के खर्च के रूप में 50,000 रुपये भी दिलाए।
क्या हुआ
मरीज की पहले हृदय वाल्व की सर्जरी हो चुकी थी। नवंबर 2013 में वाल्व में रुकावट के कारण उन्हें अस्पताल में भर्ती किया गया और थक्का घोलने का इंजेक्शन दिया गया। आदेश के अनुसार, इसके बाद एक थक्का उनके दिमाग तक पहुंच गया, जिससे उनके शरीर का दायां हिस्सा कमजोर हो गया और बोलने पर असर पड़ा, और उन्हें दूसरे अस्पताल ले जाना पड़ा। परिवार का कहना था कि अस्पताल ने बताया कि न तो सुसज्जित एंबुलेंस उपलब्ध है और न ही डॉक्टर, इसलिए उन्होंने खुद एंबुलेंस का इंतजाम किया।
इलाज के मामले में आयोग ने एक विशेषज्ञ मेडिकल बोर्ड और दिल्ली मेडिकल काउंसिल की राय पर भरोसा किया, जिनके अनुसार इलाज मानक प्रक्रिया के मुताबिक था और स्ट्रोक एक ज्ञात जटिलता है। आयोग ने कहा कि इलाज करने वाले डॉक्टर के खिलाफ चिकित्सा लापरवाही साबित नहीं होती।
लेकिन मरीज को दूसरे अस्पताल भेजने के मामले में आयोग ने कहा कि अस्पताल ने पर्याप्त व्यवस्था नहीं की, जिससे बहुमूल्य समय बर्बाद हुआ, और इसका कोई स्पष्टीकरण भी नहीं दिया। आयोग ने कहा कि मरीज को स्थानांतरित करने के लिए सुसज्जित एंबुलेंस और योग्य स्टाफ किसी अस्पताल के लिए वैकल्पिक सुविधा नहीं है, और उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 के तहत अस्पताल को सेवा में कमी का जिम्मेदार ठहराया।
अस्पताल को 6 जनवरी 2027 तक 15 लाख रुपये और 50,000 रुपये चुकाने होंगे। ऐसा न करने पर पूरी राशि पर शिकायत दर्ज होने की तारीख, 10 दिसंबर 2015, से 9% सालाना ब्याज देना होगा।
इसका क्या मतलब है
आदेश के अनुसार मरीज के प्रति अस्पताल की जिम्मेदारी दूसरे अस्पताल में स्थानांतरण के दौरान भी बनी रहती है, और परिवारों से जरूरी आपातकालीन परिवहन का खुद इंतजाम करने की अपेक्षा नहीं की जा सकती। यह भी दिखता है कि इलाज में लापरवाही न पाए जाने पर भी उपभोक्ता आयोग सेवा में कमी पा सकता है। आयोग के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है। किसी अस्पताल या अन्य सेवा प्रदाता के खिलाफ शिकायत के लिए मरीज राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 पर संपर्क कर सकते हैं या ई-दाखिल के जरिए शिकायत दर्ज कर सकते हैं।
स्रोत: Consumer commission order
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