कानूनी
बॉम्बे हाईकोर्ट ने रुपी को-ऑपरेटिव बैंक के निदेशकों पर नुकसान वसूली का आदेश रद्द किया
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को 2016 का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें रुपी को-ऑपरेटिव बैंक के निदेशकों को बैंक के कथित नुकसान के लिए निजी तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया था, और नई जांच का आदेश दिया।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने 8 अक्टूबर 2026 को 2016 का एक जांच आदेश रद्द कर दिया, जिसमें रुपी को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, पुणे के निर्वाचित निदेशकों को उस नुकसान की भरपाई के लिए निजी तौर पर जिम्मेदार ठहराया गया था, जो बैंक के अनुसार उसे हुआ था। अदालत ने मामला नए सिरे से फैसले के लिए जांच अधिकारी को वापस भेज दिया और इसे पूरा करने के लिए एक साल का समय दिया। यह फैसला निदेशकों और उनके रिश्तेदारों की याचिकाओं पर आया है।
क्या हुआ
महाराष्ट्र सहकारी संस्था अधिनियम, 1960 की Section 88 के तहत एक जांच अधिकारी ने 2 फरवरी 2016 को एक साझा आदेश पारित किया था, जिसमें बैंक के कथित नुकसान की वसूली के लिए उसे कर्मचारियों और निदेशकों में बांटा गया था। Section 88 के तहत किसी सहकारी संस्था को हुए नुकसान के लिए निजी जिम्मेदारी तय की जा सकती है। राज्य सरकार ने अपील में इस आदेश को सही ठहराया था।
बैंक के कर्मचारियों की ओर से दायर एक अलग मामले में हाईकोर्ट ने 17 अक्टूबर 2025 को यह आदेश रद्द करके मामला वापस भेज दिया था। अदालत ने कहा था कि आदेश में यह दर्ज नहीं है कि हर व्यक्ति के किस खास काम या चूक से नुकसान हुआ, और Section 88 के तहत जिम्मेदारी निजी होती है, सामूहिक नहीं। बैंक की पुनर्विचार याचिकाएं 18 अगस्त 2026 को खारिज हो गई थीं।
ताजा फैसले में अदालत ने कहा कि जांच कर्मचारियों और निदेशकों, दोनों के लिए एक साथ हुई थी, इसलिए 2016 का आदेश निदेशकों के मामले में भी रद्द होना चाहिए। विशेषज्ञ निदेशक, जिनका कहना है कि इस भूमिका में उनकी कोई निजी जिम्मेदारी नहीं बनती, यह बात जांच अधिकारी के सामने रख सकते हैं। जिन रिश्तेदारों की संपत्तियां कुर्क की गई थीं, वे उन्हें छुड़ाने के लिए सक्षम प्राधिकारी के पास आवेदन कर सकते हैं, और प्राधिकारी को यह ध्यान में रखकर फैसला करना होगा कि 2016 का आदेश रद्द हो चुका है। जांच अधिकारी यह भी तय करेंगे कि क्या कानूनी वारिसों या तीसरे पक्ष को Section 88 के तहत जिम्मेदार ठहराया जा सकता है।
इसका क्या मतलब है
फिलहाल इन निदेशकों पर निजी जिम्मेदारी तय करने वाला कोई आदेश लागू नहीं है; यह सवाल नए सिरे से तय होगा। अदालत ने कहा कि ऐसी जांच में महाराष्ट्र सहकारी संस्था नियम, 1961 के Rule 72 का पालन जरूरी है: हर व्यक्ति पर अलग-अलग आरोप, जिन सबूतों पर भरोसा किया गया उनकी प्रतियां, बचाव का मौका और हर आरोप पर अलग निष्कर्ष। किसी भी याचिकाकर्ता के खिलाफ जिम्मेदारी का कोई निष्कर्ष नहीं निकाला गया है, और नई जांच में कानूनी प्रक्रिया जारी है।
स्रोत: High Court judgment
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