कानूनी
बॉम्बे हाई कोर्ट ने 2011 के ACB रिश्वत मामले में जलगांव के समाज कल्याण अधिकारियों को बरी किया
बॉम्बे हाई कोर्ट ने जलगांव के एक पूर्व समाज कल्याण अधिकारी और एक कनिष्ठ लिपिक को बरी कर दिया और Prevention of Corruption Act के तहत 2015 में हुई उनकी सजा रद्द कर दी।

फ़ोटो: Gnoeee / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप की गई)। फ़ाइल फ़ोटो।
बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने 27 अक्टूबर 2026 को एंटी-करप्शन ब्यूरो (ACB) के एक रिश्वत मामले में हिम्मत शामराव पवार, तत्कालीन समाज कल्याण अधिकारी, समाज कल्याण कार्यालय, जलगांव, और उसी कार्यालय के तत्कालीन कनिष्ठ लिपिक कैलास चिंतामण पाटिल को बरी कर दिया। अदालत ने उनकी सजा रद्द करते हुए कहा कि अभियोजन पक्ष अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर सका।
क्या हुआ
जलगांव के एक अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 27 अगस्त 2015 को कनिष्ठ लिपिक को Prevention of Corruption Act, 1988 की धारा 7 के तहत दोषी ठहराकर दो साल के सश्रम कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सजा दी थी। समाज कल्याण अधिकारी को धारा 7 और 12 के तहत दोषी ठहराया गया था और हर अपराध के लिए एक साल के साधारण कारावास तथा 10,000 रुपये और 5,000 रुपये जुर्माने की सजा दी गई थी।
अभियोजन के अनुसार, एक गांव के सरपंच ने मई 2011 में ACB, जलगांव से शिकायत की थी कि अधिकारियों ने टांडा सुधार वस्ती योजना के तहत मंजूर 2 लाख रुपये के सड़क प्रस्ताव का डिमांड ड्राफ्ट जारी करने के लिए उसकी 5% राशि मांगी। अभियोजन ने कहा कि 1 जून 2011 को एक ट्रैप में लिपिक से 5,000 रुपये बरामद हुए।
हाई कोर्ट ने कहा कि इस अपराध के लिए रिश्वत की मांग साबित होना जरूरी है और केवल पैसे की बरामदगी से सजा नहीं टिक सकती। अदालत ने पाया कि कथित मांग शुरू से अधिकारी पर केंद्रित थी, लेकिन लिपिक की ओर से किसी मांग का नए सिरे से सत्यापन किए बिना ट्रैप उस पर मोड़ दिया गया। अदालत ने यह भी पाया कि स्वतंत्र गवाह ने इस अहम बात पर शिकायतकर्ता का समर्थन नहीं किया कि अधिकारी ने उसे लिपिक को पैसे देने को कहा था, और शिकायतकर्ता की गवाही की सावधानी से जांच जरूरी थी।
अदालत ने शिकायतकर्ता पर मुआवजा लगाने का अनुरोध ठुकरा दिया और कहा कि बरी करने का आधार अनसुलझे संदेह हैं, यह निष्कर्ष नहीं कि शिकायत झूठी थी।
इसका क्या मतलब है
बरी होने के बाद दोनों में से कोई भी अधिकारी दोषी नहीं है; आरोप साबित नहीं हुए हैं और कानून की नजर में दोनों निर्दोष माने जाते हैं। अदालत ने जमानत बॉन्ड, यदि कोई हो, रद्द कर दिए और जमानतदारों को मुक्त कर दिया।
यह फैसला दोहराता है कि ट्रैप मामलों में जांच एजेंसी को ट्रैप लगाने से पहले यह सत्यापित करना होगा कि रिश्वत किसने मांगी, और बरामद नोट मांग का सबूत नहीं हैं। किसी अधिकारी द्वारा रिश्वत मांगे जाने पर अपने राज्य के एंटी-करप्शन ब्यूरो में शिकायत की जा सकती है; हर राज्य की हेल्पलाइन के लिए Oquilia की गाइड https://www.oquilia.com/report-a-bribe पर है।
स्रोत: High Court judgment
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