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सुप्रीम कोर्ट ने आयकर पुनर्मूल्यांकन नोटिस को सही ठहराया, 'राय बदलने' की दलील खारिज

सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2026 को दो करदाताओं के आकलन वर्ष 2008-09 और 2009-10 के मामले दोबारा खोलने वाले नोटिस को सही ठहराया और कहा कि यह ठोस सामग्री पर आधारित था, केवल राय बदलना नहीं।

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आधिकारिक स्रोतSupreme Court of India
कानूनी / 28 अक्टूबर 2026

सुप्रीम कोर्ट ने 28 अक्टूबर 2026 को दो करदाताओं के आकलन वर्ष 2008-09 और 2009-10 के आयकर आकलन दोबारा खोलने वाले नोटिस को सही ठहराया और उनकी अपीलें खारिज कर दीं। कोर्ट ने कहा कि मामला दोबारा खोलना ठोस सामग्री पर आधारित था और यह कर अधिकारी की केवल राय बदलना नहीं था।

क्या हुआ

ये अपीलें दिल्ली हाई कोर्ट के 6 अगस्त 2019 के फैसले के खिलाफ थीं, जिसमें आयकर अधिनियम, 1961 की Section 147 और 148 के तहत शुरू की गई पुनर्मूल्यांकन कार्यवाही को सही ठहराया गया था। फैसले के अनुसार, करदाताओं और दो अन्य शेयरधारकों ने 19 अक्टूबर 2007 के समझौतों के तहत दो निजी कंपनियों के शेयर एक खरीदार कंपनी को 195 करोड़ रुपये और 60 करोड़ रुपये में बेचे थे।

मूल आकलन पूरा होने के बाद आयकर विभाग की नोएडा स्थित जांच इकाई ने एक रिपोर्ट तैयार की, जिसमें प्रथम दृष्टया निष्कर्ष निकाला गया कि कंपनियों की जमीन और इमारत की लागत की तुलना में शेयरों का मूल्य अधिक आंका गया था। इसी रिपोर्ट के आधार पर कर अधिकारी ने 31 मार्च 2015 का नोटिस जारी किया। करदाताओं की दलील थी कि यह केवल राय बदलना है।

कोर्ट ने यह दलील खारिज कर दी। कोर्ट ने कहा कि "विश्वास करने का कारण" का अर्थ है ठोस आधार या औचित्य: अधिकारी के पास ऐसी ठोस सामग्री होनी चाहिए जिसका आय के आकलन से छूट जाने के विश्वास से तार्किक संबंध हो, और नोटिस के चरण में उसे यह तथ्य साबित करना जरूरी नहीं है। केवल राय बदलने के आधार पर मामला दोबारा नहीं खोला जा सकता, क्योंकि अधिकारी के पास पुनर्मूल्यांकन का अधिकार है, समीक्षा का नहीं। लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह दलील तभी चलती है जब मूल आकलन में उस मुद्दे पर वास्तव में कोई राय बनाई गई हो। जहां रिटर्न केवल Section 143(1) के तहत सूचना (इंटिमेशन) के जरिए प्रोसेस हुआ, वहां कोई आकलन हुआ ही नहीं।

इसका क्या मतलब है

करदाताओं के लिए, जिस पुराने आकलन में रिटर्न को सीधे स्वीकार कर लिया गया था, वह अपने आप में मामला दोबारा खोले जाने से सुरक्षा नहीं देता। यदि आकलन आदेश से यह नहीं दिखता कि अधिकारी ने किसी खास मुद्दे पर विचार किया था, तो विभाग बाद की नई सामग्री, जैसे जांच रिपोर्ट, के आधार पर मामला दोबारा खोल सकता है। कोर्ट ने यह भी दोहराया कि कर अधिकारी केवल इसलिए मामला दोबारा नहीं खोल सकता कि अब वह उन्हीं तथ्यों पर अलग राय रखता है। कोर्ट ने कहा कि "विश्वास करने का कारण" और "राय बदलने" से जुड़े उसके पूरे सिद्धांत फैसले के पैराग्राफ 41 और 46 में दिए गए हैं।

स्रोत: Supreme Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।