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कानूनी

सुप्रीम कोर्ट: ECL Finance संबंधित पक्ष, Palm Developers की लेनदार समिति से बाहर

सुप्रीम कोर्ट ने माना कि ECL Finance और उसकी डिबेंचर ट्रस्टी दिवाला प्रक्रिया में चल रही Palm Developers के संबंधित पक्ष हैं और उसकी लेनदारों की समिति में न बैठ सकते हैं, न वोट कर सकते हैं।

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आधिकारिक स्रोतSupreme Court of India
कानूनी / 27 अक्टूबर 2026

सुप्रीम कोर्ट ने 27 अक्टूबर 2026 को ECL Finance Ltd और IDBI Trusteeship Services Ltd की अपीलें खारिज कर दीं और यह निष्कर्ष बरकरार रखा कि दोनों दिवाला प्रक्रिया में चल रही कंपनी Palm Developers Private Limited के "संबंधित पक्ष" (related party) हैं, इसलिए वे उसकी लेनदारों की समिति में न बैठ सकते हैं, न वोट कर सकते हैं। मामला एक घर खरीदार की आपत्ति से शुरू हुआ था, और कोर्ट ने माना कि एक अकेला घर खरीदार भी ऐसी आपत्ति उठा सकता है।

क्या हुआ

फैसले के अनुसार, Palm Developers ने Saha Infratech Private Limited के 110 करोड़ रुपये के डिबेंचर और 90 करोड़ रुपये की क्रेडिट सुविधा की गारंटी दी थी, जो ग्रेटर नोएडा के 'Project Encore' समेत उसकी परियोजनाओं के लिए ली गई थी। सभी डिबेंचर ECL Finance के पास थे और वही कर्जदाता भी थी; IDBI Trusteeship डिबेंचर ट्रस्टी थी। 27 जनवरी 2020 को Palm Developers के कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया में जाने के बाद दोनों ने लगभग 131.17 करोड़ रुपये और 139.03 करोड़ रुपये का दावा किया।

राष्ट्रीय कंपनी कानून न्यायाधिकरण (NCLT) और राष्ट्रीय कंपनी कानून अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) ने इन्हें संबंधित पक्ष माना था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि गारंटी दिवाला शुरू होने से पहले लागू न की गई हो, तब भी वह वित्तीय कर्ज हो सकती है, लेकिन यह माना कि दोनों संबंधित पक्ष हैं। कोर्ट ने कहा कि कर्ज और डिबेंचर के दस्तावेजों से ECL Finance को परियोजनाओं पर "सर्वव्यापी नियंत्रण" मिला था, जिसमें नॉमिनी डायरेक्टर नियुक्त करने, निर्माण बजट मंजूर करने और आवंटियों के भुगतान समेत परियोजना की आय पर नियंत्रण के अधिकार शामिल थे।

दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता की धारा 21(2) के पहले परंतुक के तहत, संबंधित पक्ष वाला वित्तीय लेनदार लेनदारों की समिति में प्रतिनिधित्व, भागीदारी या मतदान नहीं कर सकता। कोर्ट ने कहा कि यह रोक डिबेंचर ट्रस्टी पर भी लागू होती है। कोर्ट ने यह भी कहा कि ECL Finance द्वारा बाद में अपने कर्ज अधिकार दूसरी इकाई को सौंपना सद्भावपूर्ण नहीं था, और इसमें न्यायाधिकरण द्वारा उद्धृत एक फॉरेंसिक ऑडिट रिपोर्ट का उल्लेख किया, इसलिए वह इकाई भी भाग नहीं ले सकती।

इसका क्या मतलब है

दिवाला प्रक्रिया में चल रही कंपनी का भविष्य लेनदारों की समिति तय करती है। इस फैसले का मतलब है कि कर्जदार की परियोजनाओं पर ऐसा नियंत्रण रखने वाले कर्जदाता को उस समिति से बाहर रखा जा सकता है, और फैसला घर खरीदारों समेत दूसरे लेनदारों के हाथ में रहता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि एक घर खरीदार अकेले भी आपत्ति कर सकता है, केवल घर खरीदारों के अधिकृत प्रतिनिधि के जरिए ही नहीं। मामले से जुड़ी अवमानना याचिकाएं बंद कर दी गईं।

स्रोत: Supreme Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।