कानूनी
SBI कर्ज विवाद में सुप्रीम कोर्ट का फैसला, कर्जदार ARC को 125 करोड़ रुपये और देगा
सुप्रीम कोर्ट ने Atibir Industries को निर्देश दिया कि वह पहले चुकाए 250 करोड़ रुपये के अलावा 125 करोड़ रुपये और एक एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी को दे। यह SBI द्वारा सौंपे गए कर्ज का पूर्ण और अंतिम निपटान होगा।
सुप्रीम कोर्ट ने 26 अक्टूबर 2026 को स्पंज आयरन और पिग आयरन बनाने वाली कंपनी Atibir Industries Co. Ltd. को निर्देश दिया कि वह 12 हफ्तों के भीतर एक एसेट रिकंस्ट्रक्शन कंपनी (ARC) को 125 करोड़ रुपये और चुकाए। यह रकम कंपनी द्वारा पहले ही चुकाए गए 250 करोड़ रुपये के अलावा होगी। कोर्ट ने कहा कि यह उस कर्ज का पूर्ण और अंतिम निपटान होगा, जिसे State Bank of India (SBI) ने ARC को सौंप दिया था।
क्या हुआ
कंपनी ने SBI के नेतृत्व वाले बैंकों के समूह से कर्ज लिया था। फैसले के अनुसार, SBI ने 31 मार्च 2021 को यह खाता 16 अक्टूबर 2020 से नॉन-परफॉर्मिंग एसेट (NPA) घोषित किया। NPA वह कर्ज है जिसकी अदायगी रुकने के बाद उसे डूबा हुआ माना जाता है। कंपनी का तर्क था कि RBI के Covid-19 मोरेटोरियम सर्कुलरों के तहत यह वर्गीकरण समय से पहले किया गया। SBI ने कंपनी के एकमुश्त निपटान (वन-टाइम सेटलमेंट) के प्रस्ताव ठुकरा दिए, जो 227 करोड़ रुपये से बढ़कर 238 करोड़ रुपये तक पहुंचे थे, और 24 मार्च 2023 को कर्ज 250 करोड़ रुपये में ARC को सौंप दिया।
कलकत्ता हाई कोर्ट के एकल न्यायाधीश ने NPA वर्गीकरण और कर्ज सौंपने की प्रक्रिया रद्द कर दी थी। 25 जुलाई 2024 को खंडपीठ ने यह फैसला पलट दिया, जिसके बाद कंपनी ने अपील की। सुप्रीम कोर्ट के आदेशों के तहत कंपनी अब तक ARC को 250 करोड़ रुपये चुका चुकी है।
कोर्ट ने कहा कि 125 करोड़ रुपये की अतिरिक्त रकम तय करते समय उसने अपने नियुक्त एक सेवानिवृत्त न्यायाधीश की रिपोर्ट में दी गई 15% सालाना की सबसे ऊंची दर, रिपोर्ट के बाद बीते समय और ARC के खर्चों को ध्यान में रखा। कोर्ट ने यह भी कहा कि SBI द्वारा निपटान प्रस्ताव ठुकराने के तुरंत बाद कर्ज सौंपा गया। NPA वर्गीकरण और कर्ज सौंपने की वैधता के सवाल कोर्ट ने खुले छोड़ दिए।
इसका क्या मतलब है
125 करोड़ रुपये मिलने के चार हफ्तों के भीतर कर्जदाताओं को टाइटल डीड लौटानी होंगी और सभी सिक्योरिटी और गारंटी मुक्त करनी होंगी। NCLT, कोलकाता में चल रही दिवाला कार्यवाही और Debts Recovery Tribunal-I, कोलकाता में वसूली का मामला निपटा हुआ माना जाएगा। कोर्ट ने कहा कि अगर कंपनी 12 हफ्तों की समय-सीमा चूकती है, तो कर्जदाता ये कार्यवाहियां फिर शुरू कर सकते हैं और कंपनी को इस फैसले का लाभ नहीं मिलेगा।
कोर्ट ने कहा कि यह आदेश इस मामले के खास तथ्यों को देखते हुए, दोनों पक्षों और कंपनी के कर्मचारियों के हितों में संतुलन बनाने के लिए दिया गया है।
स्रोत: Supreme Court order
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