कंपनी मामले
NCLT ने गारंटर कंपनी सेवंतीलाल फकीरचंद को 1,376 करोड़ रुपये के कर्ज पर दिवाला प्रक्रिया में डाला
NCLT की मुंबई पीठ ने सेवंतीलाल फकीरचंद एंड कंपनी को उसकी अपनी अर्जी पर दिवाला प्रक्रिया में शामिल किया। बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले कंसोर्टियम ने कॉरपोरेट गारंटी के तहत 1,373 करोड़ रुपये मांगे थे।
राष्ट्रीय कंपनी विधि न्यायाधिकरण (NCLT) की मुंबई पीठ-I ने 27 अक्टूबर 2026 को सेवंतीलाल फकीरचंद एंड कंपनी प्राइवेट लिमिटेड को कॉरपोरेट दिवाला समाधान प्रक्रिया (CIRP) में शामिल कर लिया। यह दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) के तहत वह प्रक्रिया है जिसमें कर्जदाता कंपनी को बचाने या अपना बकाया वसूलने की कोशिश करते हैं। कंपनी ने खुद IBC की धारा 10 के तहत अर्जी दी थी और अपना कुल डिफॉल्ट वाला कर्ज 13,76,00,96,154.65 रुपये, यानी करीब 1,376 करोड़ रुपये बताया था।
क्या हुआ
आदेश के अनुसार, इस कर्ज का लगभग पूरा हिस्सा उन कॉरपोरेट गारंटियों से है जो कंपनी ने एंट्रिक्स डायमंड एक्सपोर्ट्स प्राइवेट लिमिटेड के कर्ज के लिए दी थीं। यह कर्ज बैंक ऑफ इंडिया के नेतृत्व वाले कर्जदाताओं के कंसोर्टियम ने दिया था। आदेश में दर्ज है कि कर्ज लेने वाली कंपनी ने डिफॉल्ट किया, उसका खाता 7 जनवरी 2016 को एनपीए घोषित हुआ और बाद में उसके परिसमापन का आदेश हुआ। गारंटी की देनदारी बनी रही।
आदेश के मुताबिक, बैंक ऑफ इंडिया ने 30 जुलाई 2026 को नया मांग नोटिस जारी किया, जिसमें कंसोर्टियम का बकाया ब्याज सहित करीब 1,373.43 करोड़ रुपये बताया गया। बाकी कर्ज में करीब 1.63 करोड़ रुपये एक संबंधित पक्ष के कर्जदाता के और करीब 95.56 लाख रुपये आपूर्तिकर्ताओं जैसे परिचालन लेनदारों के हैं। कंपनी ने पिछले तीनों वित्त वर्षों में परिचालन से कोई आय नहीं दिखाई।
न्यायाधिकरण ने माना कि अर्जी पूरी थी और कानूनी न्यूनतम सीमा से ज्यादा का डिफॉल्ट साबित हुआ। उसने कंपनी चलाने के लिए एक अंतरिम समाधान पेशेवर नियुक्त किया, प्रक्रिया की सार्वजनिक घोषणा का आदेश दिया, और कंपनी को लेनदारों की समिति की पहली बैठक तक उस पेशेवर की फीस के लिए 1.5 लाख रुपये देने का निर्देश दिया। निलंबित बोर्ड ने प्रक्रिया का खर्च उठाने का वचन दिया है।
इसका क्या मतलब है
अब IBC की धारा 14 के तहत मोरेटोरियम लागू है: प्रक्रिया चलने तक कंपनी के खिलाफ कोई मुकदमा, वसूली या सिक्योरिटी लागू करने की कार्रवाई, जिसमें SARFAESI कानून के तहत कार्रवाई भी शामिल है, आगे नहीं बढ़ सकती। सार्वजनिक घोषणा के बाद कंसोर्टियम के बैंकों समेत लेनदार अपने दावे अंतरिम समाधान पेशेवर के पास दाखिल करेंगे।
दिवाला प्रक्रिया में शामिल किया जाना धोखाधड़ी या कुप्रबंधन का निष्कर्ष नहीं है। NCLT के आदेश के खिलाफ राष्ट्रीय कंपनी विधि अपीलीय न्यायाधिकरण (NCLAT) में अपील की जा सकती है।
स्रोत: NCLT order
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