कंपनी मामले
NCLAT ने वर्ल्ड्स विंडो एक्जिम का परिसमापन और 7 करोड़ की योजना खारिज करना बरकरार रखा
NCLAT ने वर्ल्ड्स विंडो एक्जिम की 7 करोड़ रुपये की समाधान योजना खारिज करने, परिसमापन और कंपनी के मामलों की जांच के NCLT के आदेश को बरकरार रखा, लेकिन ARC के हिस्से पर लगी सीमा हटा दी।
नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) की प्रधान पीठ, नई दिल्ली ने 12 अक्टूबर 2026 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), नई दिल्ली का 14 अगस्त 2026 का वह आदेश बरकरार रखा, जिसमें वर्ल्ड्स विंडो एक्जिम प्राइवेट लिमिटेड की समाधान योजना खारिज कर कंपनी के परिसमापन और उसके मामलों की जांच का निर्देश दिया गया था। 7 करोड़ रुपये की यह योजना डिकी स्पेशल सिचुएशन इन्वेस्टमेंट ट्रस्ट-DSSF सीरीज 2 ने दी थी और कर्जदाताओं ने इसे मंजूर किया था।
क्या हुआ
आदेश के अनुसार, कंपनी अपने समूह के लिए गाजियाबाद जिले में जमीन रखने के लिए बनाई गई थी और उसका कोई कारोबार नहीं था। सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया की अर्जी पर 16 मई 2025 को उसे दिवाला प्रक्रिया में भेजा गया। प्रक्रिया के दौरान बैंक ऑफ इंडिया, बैंक ऑफ बड़ौदा और सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया का कर्ज एसेट रीकंस्ट्रक्शन कंपनी प्रूडेंट ARC लिमिटेड को सौंप दिया गया, जिसके बाद लेनदारों की समिति में उसके पास 94.86% वोट हो गए। मूल्यांकनकर्ताओं ने परिसमापन मूल्य 9,42,25,758 रुपये आंका था।
NCLAT ने अपील करने वालों की यह बात मानी कि परिसमापन मूल्य से कम की योजना अपने आप में गैरकानूनी नहीं है। लेकिन उसने कहा कि योजना यह नहीं दिखाती कि वह कंपनी के डिफॉल्ट के कारण को कैसे दूर करेगी, जैसा CIRP रेगुलेशंस का रेगुलेशन 38(3)(a) कहता है, इसलिए वह इन्सॉल्वेंसी एंड बैंकरप्सी कोड की धारा 30(2) पर खरी नहीं उतरती। उसने यह भी कहा कि प्रक्रिया के दौरान सरकारी बैंकों का कर्ज सौंपे जाने और कम पेशकश समेत कुल परिस्थितियां योजना पर NCLT के संदेह का समर्थन करती हैं, हालांकि उसने साफ किया कि उसका फैसला सिर्फ संदेह पर आधारित नहीं है।
NCLAT ने यह निर्देश बरकरार रखा कि परिसमापक कंपनी के मामलों की जांच करे और जरूरत हो तो कोड की धारा 43, 45, 50 और 66 के तहत अर्जियां दे, और कहा कि किसी भी आदेश से पहले संबंधित लोगों की सुनवाई होगी। उसने NCLT का वह निर्देश समय से पहले बताकर रद्द कर दिया, जिसमें ARC का हिस्सा सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया को चुकाई गई रकम तक सीमित किया गया था, और यह सवाल खुला रखा।
इसका क्या मतलब है
यह फैसला दिखाता है कि अगर कोई योजना अनिवार्य शर्त पूरी नहीं करती तो कर्जदाताओं की मंजूरी उसे नहीं बचा सकती, और ट्रिब्यूनल हर मामले में परिसमापन का आदेश देने से पहले कर्जदाताओं को कमी सुधारने का मौका देने के लिए बाध्य नहीं है। NCLAT के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
स्रोत: NCLAT order
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