कानूनी
NCLAT ने पर्सनल गारंटर के खिलाफ Canara Bank की दिवाला याचिका खारिज की
NCLAT ने Frost International के एक पर्सनल गारंटर के खिलाफ Canara Bank की दिवाला याचिका स्वीकार करने वाला NCLT मुंबई का आदेश रद्द कर दिया और कहा कि याचिका समय-सीमा के बाद दायर हुई थी।
नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT) ने 27 अक्टूबर 2026 को नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), मुंबई बेंच का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें Frost International Limited के एक पर्सनल गारंटर के खिलाफ Canara Bank की दिवाला याचिका स्वीकार की गई थी। अपीलेट ट्रिब्यूनल ने कहा कि बैंक की याचिका समय-सीमा खत्म होने के बाद दायर की गई थी, और उसे खारिज कर दिया।
क्या हुआ
आदेश के अनुसार, Canara Bank ने 2014 में एक कंसोर्टियम व्यवस्था के तहत Frost International को वर्किंग कैपिटल सुविधाएं दी थीं, और गारंटर ने गारंटी डीड पर हस्ताक्षर किए थे। कंपनी का खाता 17 जुलाई 2018 को एनपीए (NPA) घोषित किया गया। बाद में बैंक ने दिवाला और शोधन अक्षमता संहिता (IBC) की Section 95 के तहत NCLT का रुख किया, जो किसी लेनदार को व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू करवाने का रास्ता देती है।
NCLT ने 6 फरवरी 2026 को याचिका स्वीकार की थी। उसकी अपनी गणना में, सुप्रीम कोर्ट द्वारा तय कोविड-19 अवधि को घटाने के बाद, तीन साल की समय-सीमा 12 मार्च 2024 को खत्म हो गई थी। फिर भी उसने याचिका को समय के भीतर माना, क्योंकि Frost International की अपनी दिवाला प्रक्रिया में रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल ने बैंक का दावा स्वीकार किया था, और NCLT ने इसे कर्ज की स्वीकृति माना।
NCLAT ने कहा कि NCLT ने NCLAT के एक पुराने फैसले, Shankar Khandelwal बनाम Omkara Asset Reconstruction, पर भरोसा किया था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने कहा था कि रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा किसी दावे को स्वीकार करना एक प्रशासनिक काम है और यह लिमिटेशन एक्ट की Section 18 के तहत कर्ज की स्वीकृति नहीं है। इसी आधार पर NCLAT ने याचिका को समय-सीमा से बाहर माना और खारिज कर दिया।
इसका क्या मतलब है
कंपनी के कर्ज के पर्सनल गारंटरों के लिए इस फैसले का मतलब है कि कोई लेनदार, कर्ज लेने वाली कंपनी की दिवाला प्रक्रिया में रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल द्वारा अपना दावा स्वीकार किए जाने के सहारे, गारंटर के खिलाफ दिवाला मामले की समय-सीमा नहीं बढ़ा सकता।
लेनदारों के लिए यह आदेश बताता है कि गारंटरों के खिलाफ दिवाला याचिकाएं समय-सीमा के भीतर दायर करनी होंगी। आदेश यह तय नहीं करता कि कर्ज देय है या नहीं; यह केवल दिवाला याचिका को समय-सीमा के बाहर होने के कारण खारिज करता है। NCLAT के आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।
स्रोत: NCLAT order
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