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NCLAT ने गारंटर के खिलाफ Canara Bank की दिवाला याचिका को समय-सीमा से बाहर बताकर खारिज किया

NCLAT ने NCLT मुंबई का वह आदेश रद्द कर दिया, जिसमें Frost International के एक व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ Canara Bank की दिवाला याचिका स्वीकार की गई थी। ट्रिब्यूनल ने कहा कि याचिका समय-सीमा बीतने के बाद दायर हुई।

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आधिकारिक स्रोतNational Company Law Appellate Tribunal
कानूनी / 5 नवंबर 2026

नेशनल कंपनी लॉ अपीलेट ट्रिब्यूनल (NCLAT), नई दिल्ली ने नेशनल कंपनी लॉ ट्रिब्यूनल (NCLT), मुंबई का वह आदेश रद्द कर दिया है, जिसमें Frost International Limited के एक व्यक्तिगत गारंटर के खिलाफ दिवाला प्रक्रिया शुरू करने की Canara Bank की याचिका स्वीकार की गई थी। 27 अक्टूबर 2026 के अपने आदेश में अपीलीय ट्रिब्यूनल ने कहा कि बैंक की याचिका समय-सीमा खत्म होने के बाद दायर की गई थी, और उसे खारिज कर दिया।

क्या हुआ

आदेश के अनुसार, Canara Bank ने 2014 में बैंकों के एक समूह के हिस्से के रूप में Frost International Limited को वर्किंग कैपिटल ऋण दिए थे, जिनके साथ व्यक्तिगत गारंटी दी गई थी। कंपनी का खाता 17 जुलाई 2018 को एनपीए घोषित हुआ। बैंक ने गारंटर के खिलाफ दिवाला एवं शोधन अक्षमता संहिता की Section 95 के तहत याचिका 8 नवंबर 2024 को दायर की। NCLT ने इसे 6 फरवरी 2026 को स्वीकार कर लिया।

NCLT ने खुद यह हिसाब लगाया था कि कोविड-19 की अवधि घटाने के बाद तीन साल की समय-सीमा 12 मार्च 2024 को खत्म हो गई थी। फिर भी उसने याचिका को समय के भीतर माना, क्योंकि कंपनी की अपनी दिवाला प्रक्रिया में, जो Bank of India के आवेदन पर 9 फरवरी 2023 को शुरू हुई थी, रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल ने बैंक का दावा स्वीकार किया था। NCLT ने इसे कर्ज की स्वीकृति माना, जिससे समय-सीमा बढ़ गई।

NCLAT ने कहा कि यह नजरिया NCLAT के एक पुराने फैसले पर आधारित था, जिसे सुप्रीम कोर्ट ने 29 अप्रैल 2026 को रद्द कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट का हवाला देते हुए ट्रिब्यूनल ने कहा कि रेज़ोल्यूशन प्रोफेशनल का किसी दावे को स्वीकार करना एक प्रशासनिक कदम है और यह लिमिटेशन एक्ट की Section 18 के तहत कर्ज की स्वीकृति नहीं है। ट्रिब्यूनल ने पाया कि याचिका समय-सीमा से काफी बाद दायर हुई थी और उसे खारिज कर दिया।

इसका क्या मतलब है

कंपनियों के कर्ज के व्यक्तिगत गारंटरों के लिए इस फैसले का मतलब है कि कोई बैंक देर से दायर किए गए वसूली मामले को इस आधार पर जीवित नहीं रख सकता कि उधार लेने वाली कंपनी की दिवाला प्रक्रिया में उसका दावा स्वीकार हो चुका है। बैंकों के लिए यह याद दिलाता है कि गारंटर के खिलाफ दिवाला याचिका गारंटी लागू करने की तारीख से गिनी गई समय-सीमा के भीतर दायर होनी चाहिए। NCLAT के इस आदेश के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है।

स्रोत: NCLAT order

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।