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MP हाई कोर्ट ने लोकायुक्त रिश्वत मामले में पटवारी संतोष राठौर का बरी होना बरकरार रखा

मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2026 को दोराहा के पटवारी के बरी होने के ख़िलाफ़ लोकायुक्त को अपील की अनुमति नहीं दी और कहा कि रिश्वत की मांग साबित नहीं हुई।

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आधिकारिक स्रोतMadhya Pradesh High Court
Timeline of the Doraha patwari bribery case: land report submitted per a 6 March 2021 note sheet, an FIR in 2021 over alleged demands of Rs 35,000 and Rs 6,000, acquittal on 28 December 2024, and the High Court refusing leave to appeal on 30 October 2026.
ओक्विलिया ग्राफ़िक। स्रोत: Madhya Pradesh High Court judgment, 30 October 2026

दोराहा के हल्का पटवारी (गांव स्तर के राजस्व अधिकारी) संतोष राठौर लोकायुक्त के रिश्वत मामले में बरी ही रहेंगे। मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने 30 अक्टूबर 2026 को लोकायुक्त के विशेष पुलिस स्थापना को उनके बरी होने के ख़िलाफ़ अपील करने की अनुमति देने से इनकार कर दिया। अदालत ने माना कि रिश्वत की कोई मांग साबित नहीं हुई।

क्या हुआ

फ़ैसले के अनुसार, दो शिकायतकर्ताओं ने विशेष पुलिस स्थापना (SPE), लोकायुक्त, भोपाल से कहा था कि पटवारी ने पारिवारिक ज़मीन के बंटवारे का काम करने के लिए एक से 35,000 रुपये और दूसरे से 6,000 रुपये मांगे। SPE ने 2021 में भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 की Section 7 के तहत FIR दर्ज की, जो लोक सेवक के रिश्वत लेने से जुड़ा प्रावधान है, और ट्रैप लगाया। फ़ैसले में दर्ज है कि ट्रैप विफल रहा और उसे बंद कर दिया गया।

विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम), सीहोर ने 28 दिसंबर 2024 को उन्हें बरी कर दिया था। इसके बाद लोकायुक्त ने अपील के लिए हाई कोर्ट से अनुमति मांगी, जो बरी होने के ख़िलाफ़ राज्य की अपील से पहले कानूनन ज़रूरी है।

हाई कोर्ट ने माना कि 6 मार्च 2021 की नोटशीट से पता चलता है कि पटवारी शिकायत से पहले ही ज़मीन पर अपनी रिपोर्ट दे चुके थे, इसलिए निचली अदालत ने मांग के बताए गए कारण को झूठा मानने में कोई गलती नहीं की। अदालत ने कहा कि दोनों शिकायतकर्ताओं ने अदालत में मांग से इनकार किया, रिकॉर्ड की गई बातचीत चलाने पर सुनाई नहीं दी, और किसी गवाह ने पटवारी की आवाज़ की पहचान नहीं की। अदालत ने माना कि सबूतों से रिश्वत मांगने या लेने की कोशिश तक साबित नहीं होती।

ये आरोप थे, दोष के निष्कर्ष नहीं; अदालत में दोष साबित होने तक आरोपी निर्दोष माना जाता है, और निचली अदालत का बरी करने का फ़ैसला अब कायम है।

इसका क्या मतलब है

अदालत ने कहा कि बरी होने से निर्दोषता की धारणा और मज़बूत होती है, और अपील की अनुमति के लिए प्रथम दृष्टया मामला या बहस योग्य मुद्दा चाहिए, जो उसे यहां नहीं मिला। फ़ैसले में कहा गया है कि ट्रैप विफल होने भर से अपराध ख़ारिज नहीं होता, क्योंकि Section 7 अनुचित लाभ पाने की कोशिश को भी शामिल करती है, लेकिन उस कोशिश को भी भरोसेमंद सबूत से साबित करना होता है।

किसी अधिकारी द्वारा रिश्वत मांगे जाने पर कोई भी व्यक्ति अपने राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को इसकी शिकायत कर सकता है; हर राज्य की हेल्पलाइन की Oquilia की गाइड https://www.oquilia.com/report-a-bribe पर है।

स्रोत: High Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।