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महाराष्ट्र उपभोक्ता आयोग ने Tata AIG के खिलाफ 16.49 लाख रुपये का कार क्लेम बरकरार रखा

महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता आयोग ने Tata AIG की अपील खारिज की और कहा कि बीमा कंपनी कार दुर्घटना क्लेम ठुकराने के लिए नशे में ड्राइविंग का आधार साबित नहीं कर पाई।

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आधिकारिक स्रोतConsumer commission
A handwritten insurance note from 1857 on aged paper

फ़ोटो: Wikimedia Commons, public domain (क्रॉप की गई)। सांकेतिक तस्वीर।

महाराष्ट्र राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग ने 5 नवंबर 2026 को Tata AIG General Insurance की अपील खारिज कर दी और वह आदेश बरकरार रखा, जिसमें कंपनी को एक कार मालिक को 16,49,370 रुपये देने को कहा गया था। कंपनी ने यह दुर्घटना क्लेम नशे में ड्राइविंग के आधार पर ठुकरा दिया था। बीमा कंपनी को 20 जुलाई 2005 से भुगतान तक 12% सालाना ब्याज भी देना होगा।

क्या हुआ

आदेश के अनुसार, पॉलिसीधारक के पास 26 जून 2004 से 25 जून 2005 तक की Tata AIG की प्राइवेट कार पैकेज पॉलिसी थी। 14 मई 2005 को मुंबई के माहिम के पास कार दुर्घटनाग्रस्त हो गई, तब पॉलिसीधारक का बेटा गाड़ी चला रहा था। पुलिस FIR में आरोप लगाया गया कि चालक नशे में था, और एक फॉरेंसिक लैब रिपोर्ट में खून के प्रति 100 ml में 126 mg अल्कोहल दर्ज किया गया। इन्हीं के आधार पर बीमा कंपनी ने 20 जुलाई 2005 को पॉलिसी की उस शर्त के तहत क्लेम ठुकरा दिया, जो नशे में ड्राइविंग पर कवर नहीं देती।

दक्षिण मुंबई के एक जिला आयोग ने पॉलिसीधारक की शिकायत आंशिक रूप से मंजूर की। उसने 15% मूल्यह्रास घटाकर सर्वेयर द्वारा आंके गए 16,49,370 रुपये के नुकसान के साथ मानसिक उत्पीड़न के लिए 20,000 रुपये, गैराज खर्च के लिए 20,000 रुपये और मुकदमे के खर्च के लिए 5,000 रुपये दिलाए।

राज्य आयोग ने कहा कि जो बीमा कंपनी किसी अपवाद शर्त का सहारा लेती है, उसे साबित करने की जिम्मेदारी उसी की है, और सैंपल लेने, रखने और संभालने का तरीका दिखाए बिना केवल FIR या विवादित लैब रिपोर्ट काफी नहीं है। आयोग ने कहा कि केवल 2 ml खून लिया गया, मौके पर ब्रेथ-एनालाइज़र टेस्ट नहीं हुआ, और सैंपल की जांच में लगे समय तथा उसके संरक्षण पर सवाल बने रहे। आयोग ने यह भी कहा कि चालक के खिलाफ आपराधिक मामला दोषसिद्धि में खत्म नहीं हुआ: हाई कोर्ट ने समझौते के बाद उसे रद्द कर दिया। FIR एक आरोप है, दोष का निष्कर्ष नहीं; अदालत में दोष साबित होने तक आरोपी निर्दोष माने जाते हैं।

इसका क्या मतलब है

वाहन बीमा पॉलिसीधारकों के लिए यह आदेश कहता है कि नशे में ड्राइविंग की शर्त पर क्लेम ठुकराने वाली बीमा कंपनी को भरोसेमंद सबूत से अपना पक्ष साबित करना होगा, केवल FIR या विवादित टेस्ट से नहीं। आयोग ने सर्वेयर के आकलन को भी उचित माना। राज्य आयोग के आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है। बीमा क्लेम के विवाद में उपभोक्ता राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन (1915) से मदद ले सकते हैं या e-Daakhil पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं।

स्रोत: Consumer commission order

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।