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केरल हाई कोर्ट ने केरल बैंक के खिलाफ कर्जदारों की किस्तों की दूसरी अर्जी खारिज की

केरल हाई कोर्ट ने केरल बैंक की SARFAESI वसूली के खिलाफ किस्तों की मांग वाली दो कर्जदारों की दूसरी याचिका खारिज कर दी, क्योंकि वे पहले दी गई छूट के अनुसार भुगतान नहीं कर पाए थे।

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आधिकारिक स्रोतKerala High Court
The Kerala High Court building in Kochi

फ़ोटो: Augustus Binu / www.dreamsparrow.net / facebook / Wikimedia Commons, CC BY-SA 3.0 (क्रॉप की गई)। फ़ाइल फ़ोटो।

केरल हाई कोर्ट ने 29 अक्टूबर 2026 को दो कर्जदारों की वह रिट याचिका खारिज कर दी, जिसमें उन्होंने दूसरी बार केरल स्टेट को-ऑपरेटिव बैंक (केरल बैंक) का बकाया किस्तों में चुकाने की अनुमति मांगी थी। कोर्ट ने कहा कि जिन कर्जदारों ने पहले दी गई किस्तें नहीं चुकाईं, वे उसी वसूली कार्यवाही में दोबारा वही राहत नहीं मांग सकते।

क्या हुआ

केरल बैंक ने कर्जदारों के खिलाफ SARFAESI Act, 2002 के तहत वसूली कार्यवाही शुरू की थी। यह कानून बैंकों को सिविल कोर्ट गए बिना कर्ज के बदले गिरवी रखी संपत्ति पर कब्जा करने और उसे बेचने का अधिकार देता है।

कर्जदार पहले भी हाई कोर्ट गए थे। 4 जून 2026 के फैसले में कोर्ट ने वह याचिका निपटाते हुए उन्हें बकाया किस्तों में चुकाने की अनुमति दी थी। फैसले के अनुसार, कर्जदारों ने निर्देश के मुताबिक किस्तें नहीं चुकाईं और बैंक ने वसूली जारी रखी। 3 अक्टूबर 2026 को एक एडवोकेट कमिश्नर ने उन्हें नोटिस जारी किया।

इसके बाद कर्जदारों ने बाद की कार्रवाई के खिलाफ नई याचिका दायर की और फिर से किस्तों में भुगतान की अनुमति मांगी। उनका तर्क था कि उनकी शिकायत नई कार्रवाइयों से जुड़ी है, इसलिए पिछला फैसला इसमें बाधा नहीं है।

कोर्ट इससे सहमत नहीं हुआ। सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि res judicata का सिद्धांत, जो एक ही विवाद को दो बार लड़ने से रोकता है, रिट याचिकाओं पर भी लागू होता है। कोर्ट ने कहा कि जो पक्ष पिछली रिट में तय शर्तों का पालन नहीं करता और उसी कार्यवाही के बाद के चरण में फिर वही निर्देश मांगता है, वह अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग कर रहा है। कोर्ट ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट के अनुसार रिट क्षेत्राधिकार में SARFAESI कार्यवाही में दखल की गुंजाइश बेहद सीमित है।

इसका क्या मतलब है

SARFAESI वसूली का सामना कर रहे कर्जदारों के लिए यह फैसला दिखाता है कि हाई कोर्ट से मिली किस्तों की राहत शर्तों के साथ आती है, जिनका पालन जरूरी है। फैसले के अनुसार, जो कर्जदार निर्देश के मुताबिक भुगतान नहीं करता, वह उसी कर्ज पर नई रिट में दोबारा वही राहत मिलने की उम्मीद नहीं कर सकता, और बैंक वसूली जारी रख सकता है।

इस फैसले को ऊपरी पीठ या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है।

स्रोत: High Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।