कानूनी
केरल हाई कोर्ट: पक्ष के सबूत के बिना पारित DRT आदेश रद्द किया जा सकता है
केरल हाई कोर्ट ने 29 अक्टूबर 2026 को South Indian Bank के वसूली मामले में DRT और DRAT के आदेश रद्द किए और कहा कि DRT का 2019 का आदेश एकपक्षीय आदेश की प्रकृति का था।
केरल हाई कोर्ट ने कहा है कि अगर किसी पक्ष द्वारा कोई सबूत पेश न किए जाने के बाद ऋण वसूली न्यायाधिकरण (DRT) आदेश पारित करता है, तो वह एकपक्षीय (ex parte) आदेश की प्रकृति का होता है, और उसे रद्द करने की अर्जी पर सुनवाई होनी चाहिए। 29 अक्टूबर 2026 को सुनाए गए फैसले में कोर्ट ने South Indian Bank के एक वसूली मामले में DRT और ऋण वसूली अपीलीय न्यायाधिकरण (DRAT) के वे आदेश रद्द कर दिए जिनमें ऐसी अर्जी ठुकरा दी गई थी।
क्या हुआ
South Indian Bank ने एक कर्जदार से बकाया वसूली के लिए DRT-II, एर्णाकुलम में मामला दायर किया था। 2008 में कर्जदार से जमीन खरीदने वाले दो लोगों को भी पक्षकार बनाया गया, क्योंकि बैंक का दावा उस संपत्ति पर भी था जिसे वे अपनी बताते हैं। उन्होंने लिखित बयान तो दिया, लेकिन सबूत पेश नहीं किए। उनके अनुसार, उनके वकील ने वह हलफनामा और दस्तावेज दाखिल नहीं किए जो उन्होंने सौंपे थे। 22 जनवरी 2019 को DRT ने बैंक का मामला स्वीकार कर लिया।
उस आदेश को रद्द करने की उनकी अर्जी DRT ने 22 जुलाई 2022 को यह कहते हुए खारिज कर दी कि आदेश गुण-दोष के आधार पर पारित हुआ था। DRAT, चेन्नई ने 7 अगस्त 2025 को इसे बरकरार रखा।
हाई कोर्ट ने कहा कि DRT ने उनका पक्ष मुख्य रूप से इसलिए खारिज किया था क्योंकि कोई सबूत पेश नहीं हुआ था, इसलिए वह आदेश एकपक्षीय आदेश की प्रकृति का था। कोर्ट ने कहा कि DRT सिविल कोर्ट नहीं है, फिर भी सिविल प्रक्रिया संहिता के बुनियादी सिद्धांत उसका मार्गदर्शन कर सकते हैं, और Recovery of Debts and Bankruptcy Act, 1993 की Section 22(2)(g) DRT को एकपक्षीय आदेश रद्द करने का अधिकार देती है। कोर्ट ने दोनों न्यायाधिकरणों के आदेशों को गलत बताया और कहा कि इनसे न्याय नहीं हो सका।
बैंक के हितों का संतुलन बनाने के लिए कोर्ट ने याचिकाकर्ताओं को दो हफ्ते में बैंक को 25,000 रुपये खर्च के रूप में देने का आदेश दिया। भुगतान करने पर DRT को उनकी अर्जी पर दो महीने में नए सिरे से फैसला करना होगा, और तब तक 2019 के आदेश के तहत आगे की कार्रवाई रुकी रहेगी।
इसका क्या मतलब है
DRT में पक्षकार बने कर्जदार, गारंटर और संपत्ति खरीदार, जिनका मामला सबूत पेश न कर पाने के बाद तय हो गया, न्यायाधिकरण से वह आदेश रद्द करने की मांग कर सकते हैं, बजाय इसके कि उसे गुण-दोष पर हुआ फैसला मान लिया जाए।
स्रोत: High Court judgment
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