कानूनी
चंडीगढ़ उपभोक्ता आयोग का आदेश: सुषमा बिल्डटेक 12% ब्याज के साथ 62.78 लाख रुपये लौटाए
चंडीगढ़ राज्य उपभोक्ता आयोग ने जीरकपुर के फ्लैट का कब्जा न देने पर सुषमा बिल्डटेक को सेवा में कमी का दोषी माना और 12% ब्याज के साथ 62.78 लाख रुपये पूरे लौटाने का आदेश दिया।

फ़ोटो: MaxnaCarta / Wikimedia Commons, CC BY-SA 4.0 (क्रॉप की गई)। सांकेतिक तस्वीर।
राज्य उपभोक्ता विवाद निवारण आयोग, यू.टी. चंडीगढ़ ने 29 अक्टूबर 2026 को सुषमा बिल्डटेक लिमिटेड को एक घर खरीदार दंपती को 62.78 लाख रुपये (62,77,598 रुपये) लौटाने का आदेश दिया, साथ में हर जमा की तारीख से 12% सालाना ब्याज। आयोग ने जीरकपुर के सुषमा क्रेसेंट प्रोजेक्ट के एक फ्लैट के मामले में बिल्डर को सेवा में कमी का दोषी माना और अनुचित व्यापार व्यवहार पाया।
क्या हुआ
आदेश के अनुसार, दंपती ने अक्टूबर 2022 में 66,55,698 रुपये कीमत का 1,590 वर्ग फुट का फ्लैट खरीदने का समझौता किया था, जिसका कब्जा 31 अक्टूबर 2023 तक मिलना था। उन्होंने 62,77,598 रुपये चुकाए, जिनमें 40,11,500 रुपये बैंक ऑफ बड़ौदा के होम लोन से दिए गए। आदेश में दर्ज है कि बाद के समझौतों के जरिए कब्जे की तारीख पहले 1 नवंबर 2024, फिर 31 जुलाई 2025 और आखिर में 31 दिसंबर 2025 तक बढ़ाई गई, और बिल्डर ने 30,000 रुपये महीने का देरी मुआवजा केवल नवंबर 2023 से नवंबर 2024 तक दिया।
27 सितंबर 2025 को बिल्डर ने कागज पर कब्जे की पेशकश की। आयोग ने कहा कि ऐसी पेशकश से बिल्डर की जिम्मेदारी तब तक पूरी नहीं होती जब तक यूनिट पूरी, रहने लायक और जरूरी वैधानिक मंजूरियों के साथ न हो, और रिकॉर्ड पर यह साबित नहीं हुआ। समय पर जवाब दाखिल न करने के कारण अप्रैल 2026 में बिल्डर का बचाव खारिज कर दिया गया था।
आयोग ने बिल्डर और उसके दो निदेशकों को संयुक्त रूप से और अलग-अलग, आदेश मिलने के 30 दिन के भीतर रकम लौटाने को कहा है, ऐसा न होने पर ब्याज 15% सालाना हो जाएगा। पहले मिले 30,000 रुपये महीने के भुगतान को समायोजित किया जाएगा। आयोग ने 75,000 रुपये मुआवजा और 35,000 रुपये मुकदमे का खर्च भी देने का आदेश दिया। बैंक ऑफ बड़ौदा की ओर से कोई कमी नहीं पाई गई और उसके खिलाफ शिकायत खारिज कर दी गई; लोन की बकाया रकम तक इस पैसे पर पहला हक बैंक का होगा।
इसका क्या मतलब है
आदेश कहता है कि खरीदार बार-बार बढ़ाई गई तारीखें या ऐसी यूनिट का कागजी कब्जा मानने को बाध्य नहीं है जिसके पास रहने की जरूरी मंजूरियां न हों; वह प्रोजेक्ट से हटकर ब्याज सहित पूरी रकम वापस मांग सकता है। इससे यह भी साफ होता है कि केवल होम लोन देने वाले बैंक को बिल्डर की देरी के लिए जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। इस आदेश के खिलाफ अपील की जा सकती है। ऐसी ही देरी झेल रहे खरीदार e-Daakhil पर शिकायत दर्ज कर सकते हैं या राष्ट्रीय उपभोक्ता हेल्पलाइन 1915 से मदद ले सकते हैं।
स्रोत: Consumer commission order
यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।