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बॉम्बे हाई कोर्ट ने ACB रिश्वत मामले में जलगांव के समाज कल्याण अधिकारी और लिपिक को बरी किया

बॉम्बे हाई कोर्ट ने 27 अक्टूबर 2026 को जलगांव के समाज कल्याण अधिकारी और एक लिपिक की 2015 की रिश्वत मामले में सज़ा रद्द की और कहा कि ACB का मामला साबित नहीं हुआ।

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आधिकारिक स्रोतBombay High Court
Timeline of the Jalgaon ACB bribery case: complaint in May 2011 over 5% of a Rs 2 lakh grant, a trap on 1 June 2011 recovering Rs 5,000, convictions on 27 August 2015, and acquittal by the Bombay High Court on 27 October 2026.
ओक्विलिया ग्राफ़िक। स्रोत: Bombay High Court judgment, 27 October 2026

जलगांव के समाज कल्याण कार्यालय के पूर्व समाज कल्याण अधिकारी हिम्मत शामराव पवार और कनिष्ठ लिपिक कैलास चिंतामण पाटिल को भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो (ACB) के रिश्वत मामले में बरी कर दिया गया है। बॉम्बे हाई कोर्ट की औरंगाबाद पीठ ने 27 अक्टूबर 2026 को 2015 में हुई उनकी सज़ा रद्द कर दी और कहा कि अभियोजन अपना मामला संदेह से परे साबित नहीं कर पाया।

क्या हुआ

फ़ैसले के अनुसार, एक गांव के सरपंच ने मई 2011 में ACB, जलगांव से शिकायत की थी कि दोनों अधिकारियों ने उसके गांव के लिए मंज़ूर 2 लाख रुपये के विकास अनुदान का 5%, यानी 10,000 रुपये, डिमांड ड्राफ्ट जारी करने के लिए मांगे। फ़ैसले में दर्ज है कि 1 जून 2011 को ACB के ट्रैप में लिपिक से 5,000 रुपये बरामद हुए।

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश, जलगांव ने 27 अगस्त 2015 को दोनों को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत दोषी ठहराया था। लिपिक को दो साल के सश्रम कारावास और 10,000 रुपये जुर्माने की सज़ा मिली; Section 7 और 12 के तहत दोषी ठहराए गए अधिकारी को हर आरोप में एक साल का साधारण कारावास और 10,000 रुपये व 5,000 रुपये का जुर्माना हुआ।

हाई कोर्ट ने माना कि कथित मांग शुरू से अधिकारी पर थी, लेकिन ट्रैप को बिना यह दोबारा जांचे लिपिक की ओर मोड़ दिया गया कि क्या लिपिक ने पैसे मांगे थे, और अदालत के अनुसार इससे असली मांग पर संदेह पैदा होता है। अदालत ने पाया कि शैडो गवाह ने शिकायतकर्ता के इस अहम दावे का समर्थन नहीं किया कि अधिकारी ने उसे लिपिक को पैसे देने को कहा था। अदालत ने दोनों अपीलें मंज़ूर कर लीं।

ये आरोप थे, दोष के निष्कर्ष नहीं; सज़ा रद्द होने के बाद दोनों पूर्व अधिकारी निर्दोष माने जाते हैं, और अब इस मामले में हाई कोर्ट का आदेश लागू है।

इसका क्या मतलब है

अदालत ने दोहराया कि रिश्वत की मांग इस अपराध का अनिवार्य तत्व है और अधिनियम की Section 20 के तहत कानूनी अनुमान लागू होने से पहले इसे साबित करना ज़रूरी है। अदालत ने शिकायतकर्ता के ख़िलाफ़ मुआवज़े का आदेश देने का अनुरोध ठुकरा दिया और कहा कि बरी होने का आधार अनसुलझे संदेह हैं, यह निष्कर्ष नहीं कि शिकायत झूठी थी।

इस फ़ैसले के ख़िलाफ़ सुप्रीम कोर्ट में अपील की जा सकती है। किसी अधिकारी द्वारा रिश्वत मांगे जाने पर कोई भी व्यक्ति अपने राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को इसकी शिकायत कर सकता है; हर राज्य की हेल्पलाइन की Oquilia की गाइड https://www.oquilia.com/report-a-bribe पर है।

स्रोत: High Court judgment

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