कानूनी
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सहकारी कर्ज के लिए किसान की जमीन की 1996 की नीलामी रद्द की
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सहकारी कर्ज के बकाये के लिए हुई एक कर्जदार की खेती की जमीन की नीलामी रद्द कर दी। कोर्ट ने कहा कि यह साबित नहीं हुआ कि नोटिस और बिक्री के नियमों का पालन हुआ।
इलाहाबाद हाई कोर्ट ने सहकारी कर्ज की वसूली के लिए 1996 में की गई एक किसान की खेती की जमीन की नीलामी रद्द कर दी है। यह फैसला 24 अक्टूबर 2026 को सुनाया गया। लखनऊ बेंच ने कहा कि डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, गोंडा समेत प्रतिवादी यह नहीं दिखा पाए कि नोटिस और बिक्री की अनिवार्य प्रक्रिया का पालन किया गया था। कोर्ट ने कर्जदार को जमीन खाली करने को कहने वाला 2012 का नोटिस भी रद्द कर दिया।
क्या हुआ
फैसले के अनुसार, याचिकाकर्ता और उनकी दिवंगत पत्नी ने 1990 में गोंडा जिले के मनकापुर की एक प्राथमिक सहकारी समिति से 20,000 रुपये और 50,000 रुपये के कृषि कर्ज लिए थे। बकाया न चुकाए जाने पर 13.98 एकड़ और 1.83 एकड़ के दो भूखंड 1996 में नीलाम किए गए और उप जिलाधिकारी, मनकापुर ने 1997 में बिक्री को मंजूरी दी। डिस्ट्रिक्ट कोऑपरेटिव बैंक, गोंडा को नीलामी में खरीदार घोषित किया गया। मार्च 2012 में बैंक ने कर्जदार को जमीन खाली करने का नोटिस दिया।
कर्जदार की दलील थी कि उन्हें नीलामी की कोई जानकारी नहीं दी गई और नीलामी करने तथा उसे मंजूरी देने वाले अधिकारियों के पास इसका अधिकार नहीं था। कोर्ट ने कहा कि प्रतिवादियों ने ऐसा कोई रिकॉर्ड पेश नहीं किया जिससे वैध कुर्की, मांग नोटिस, बिक्री की उद्घोषणा या जरूरी प्रचार साबित हो। कोर्ट ने यह भी पाया कि वे यह साबित नहीं कर सके कि नीलामी करने वाले तहसीलदार नियमों के तहत 'सेल ऑफिसर', यानी ऐसी बिक्री कराने के लिए अधिकृत अधिकारी, थे। कोर्ट ने यह आपत्ति भी खारिज कर दी कि याचिका देर से दायर हुई और दूसरा उपाय मौजूद था। कोर्ट ने कहा कि जहां अधिकारियों के अधिकार और अनिवार्य सुरक्षा उपायों पर सवाल हो, वहां देरी पूरी तरह रोक नहीं है।
इसका क्या मतलब है
कोर्ट ने कहा कि बकाया कर्ज से कर्जदाता को यह असीमित अधिकार नहीं मिल जाता कि वह बिक्री की तय प्रक्रिया अपनाए बिना कर्जदार की संपत्ति ले ले। सहकारी समितियों और बैंकों के कर्जदारों के लिए यह फैसला साफ करता है कि वसूली के लिए बिक्री से पहले नोटिस, उचित प्रचार और कानूनी अधिकार वाले अधिकारियों की कार्रवाई जरूरी है।
यह फैसला कर्ज को खत्म नहीं करता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि सक्षम प्राधिकारी या सहकारी समिति कानूनन वसूली योग्य बकाया की वसूली अब भी कर सकती है, बशर्ते वह अनिवार्य प्रक्रिया और प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का पालन करे, जिनके तहत किसी के खिलाफ कार्रवाई से पहले उसकी बात सुनी जानी चाहिए।
स्रोत: High Court judgment
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