टैक्स
मद्रास हाई कोर्ट ने Andhra Bank अधिकारियों की स्टाफ लोन लाभ पर टैक्स के खिलाफ याचिका खारिज की
मद्रास हाई कोर्ट ने पहले के फैसलों का हवाला देते हुए ब्याज-मुक्त या रियायती स्टाफ लोन के लाभ पर इनकम टैक्स को चुनौती देने वाली Andhra Bank अधिकारियों के महासंघ की याचिका खारिज कर दी।
मद्रास हाई कोर्ट ने All India Andhra Bank Officers Federation की 2010 में दायर रिट याचिका खारिज कर दी है, जिसमें बैंक कर्मचारियों को ब्याज-मुक्त या रियायती लोन से मिलने वाले लाभ पर लगने वाले इनकम टैक्स को चुनौती दी गई थी। 14 अक्टूबर 2026 के आदेश में अदालत की खंडपीठ ने कहा कि यह सवाल उसके अपने पहले के फैसले और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले ही तय हो चुका है।
क्या हुआ
महासंघ ने अदालत से Income Tax Act की Section 17(2)(vi), Income Tax Rules के Rule 3(7)(i) और Andhra Bank के 26 दिसंबर 2009 के एक सर्कुलर के हिस्से को असंवैधानिक और शून्य घोषित करने की मांग की थी। बैंक के साथ भारत सरकार, Central Board of Direct Taxes और मुख्य आयकर आयुक्त, चेन्नई प्रतिवादी थे।
अदालत ने कहा कि इसी अदालत की एक खंडपीठ ने पहले ऐसी ही याचिकाओं के समूह की सुनवाई कर Section 17(2)(viii) और Rule 3(7)(i) की वैधता बरकरार रखी थी। अदालत ने यह भी कहा कि सुप्रीम कोर्ट ने 2024 के एक फैसले में उस निर्णय के खिलाफ अपीलें खारिज कर Section 17(2) और Rule 3(7) को सही ठहराया।
आदेश में सुप्रीम कोर्ट के फैसले का हवाला है कि बैंक कर्मचारियों को ब्याज-मुक्त या रियायती लोन से मिलने वाला लाभ एक पर्क्विजिट, यानी वेतन के अलावा मिलने वाला लाभ है, और इसलिए उस पर टैक्स लगता है। सुप्रीम कोर्ट ने यह भी कहा कि इस लाभ का मूल्य तय करने के लिए State Bank of India की लेंडिंग रेट (PLR) को आधार बनाना न तो मनमाना है और न ही भेदभावपूर्ण। चूंकि मुद्दा इन फैसलों से पूरी तरह तय था, हाई कोर्ट ने याचिका खारिज कर दी और खर्च पर कोई आदेश नहीं दिया।
इसका क्या मतलब है
जो बैंक कर्मचारी अपने नियोक्ता बैंक से कम ब्याज दर पर लोन लेते हैं, उनके लिए यह आदेश पुष्टि करता है कि अदालत इस सवाल को दोबारा नहीं खोलेगी: पहले के फैसलों के अनुसार इस लाभ पर पर्क्विजिट के रूप में टैक्स लग सकता है, जिसका मूल्य State Bank of India की दर के आधार पर तय होता है।
आदेश कोई नई दर या समय-सीमा तय नहीं करता। यह 2010 से लंबित याचिका को हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट द्वारा पहले से तय कानून लागू करके बंद करता है।
स्रोत: High Court judgment
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