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केरल हाई कोर्ट ने Canara Bank कर्ज वसूली मामले में गिरफ्तारी वारंट रद्द किया

केरल हाई कोर्ट ने कहा कि जब कर्जदार भुगतान के साधन न होने की दलील दे, तो गिरफ्तारी वारंट से पहले Canara Bank को अपने मैनेजर के बयान से ज्यादा कुछ दिखाना होगा।

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आधिकारिक स्रोतKerala High Court
कानूनी / 24 अक्टूबर 2026

केरल हाई कोर्ट ने 13 October 2026 को Canara Bank के कर्ज वसूली मामले में एक जजमेंट डेटर के खिलाफ गिरफ्तारी वारंट जारी करने वाला आदेश रद्द कर दिया। कोर्ट ने कहा कि जब कर्जदार साफ तौर पर यह दलील दे कि उसके पास भुगतान के साधन नहीं हैं, तो उचित जांच जरूरी है और बैंक को अपने मैनेजर के बयान से ज्यादा कुछ पेश करना होगा। कोर्ट ने मामला सब कोर्ट, मंजेरी को वापस भेजकर दो महीने में फैसला करने को कहा।

क्या हुआ

Canara Bank की कोंडोट्टी शाखा ने 2013 में दायर एक मुकदमे में डिक्री, यानी पैसे चुकाने का अदालती आदेश, हासिल की थी। इसके बाद 2024 में रकम वसूलने के लिए एक्जीक्यूशन याचिका दायर की गई। जजमेंट डेटर वह व्यक्ति होता है जिसे अदालत ने भुगतान करने का आदेश दिया हो।

एक्जीक्यूशन की कार्यवाही में बैंक के मैनेजर ने बयान दिया कि स्थानीय पूछताछ में पता चला कि जजमेंट डेटर खेती करता है और इसलिए उसके पास भुगतान के साधन हैं। जजमेंट डेटर ने आपत्ति दर्ज कर कहा कि उसके पास न तो भुगतान के साधन हैं और न ही जमीन-जायदाद। सब कोर्ट ने सिर्फ मैनेजर की मौखिक गवाही के आधार पर माना कि कर्जदार भुगतान कर सकता है और गिरफ्तारी वारंट जारी कर दिया।

हाई कोर्ट ने कहा कि सब कोर्ट ने एक पुराने फैसले पर भरोसा किया था, जिसके अनुसार डिक्री होल्डर से कर्जदार के साधनों को दस्तावेजों से साबित करने की उम्मीद नहीं की जा सकती। हाई कोर्ट ने कहा कि यह फैसला वहां लागू होता है जहां कर्जदार कर्ज पर विवाद नहीं करता या साधन न होने की दलील नहीं देता। जहां कर्जदार साधन न होने की दलील देता है, वहां जांच जरूरी है और डिक्री होल्डर को अपने बयान से ज्यादा कुछ पेश करना होगा।

कोर्ट ने 20 August 2026 का आदेश रद्द कर दिया और सब कोर्ट को निर्देश दिया कि वह नए सिरे से तय करे कि कर्जदार के पास भुगतान के साधन हैं या नहीं, और दोनों पक्षों को सबूत पेश करने का पर्याप्त मौका दे।

इसका क्या मतलब है

सिविल कोर्ट के जरिए वसूली का सामना कर रहे कर्जदारों के लिए यह फैसला साफ करता है कि अगर कर्जदार ने औपचारिक रूप से भुगतान में असमर्थता की दलील दी है, तो सिर्फ कर्ज देने वाले के कहने पर गिरफ्तारी वारंट जारी नहीं होना चाहिए। कर्ज देने वाले को अपने दावे के समर्थन में सबूत देना होगा, और कर्जदार भी सबूत पेश कर सकता है।

यह दीवानी कर्ज का मामला है, आपराधिक नहीं; इसमें किसी को दोषी नहीं ठहराया गया है, कर्जदार को किसी भी गलत काम में निर्दोष माना जाता है, और कानूनी प्रक्रिया जारी है। यह फैसला कर्ज को खत्म नहीं करता। बैंक की सेवा से जुड़ी शिकायत RBI के पोर्टल https://cms.rbi.org.in पर दर्ज की जा सकती है।

स्रोत: High Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।