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इलाहाबाद हाई कोर्ट: लंबित SARFAESI याचिका बैंक के DRT वसूली मामले में बाधा नहीं

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा कि कर्जदार की SARFAESI याचिका लंबित रहते हुए भी ग्रामीण बैंक को डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल में वसूली मामला दायर करने से कोई प्रावधान नहीं रोकता, और याचिका खारिज कर दी।

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आधिकारिक स्रोतAllahabad High Court
कानूनी / 25 अक्टूबर 2026

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने बाराबंकी में U.P. Gramin Bank द्वारा जारी बिक्री नोटिस को चुनौती देने वाली दो कर्जदारों की रिट याचिका खारिज कर दी है। 14 अक्टूबर 2026 के फैसले में लखनऊ पीठ ने कहा कि कोई भी प्रावधान बैंक को SARFAESI Act के तहत कार्रवाई करते हुए डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल में वसूली मामला दायर करने से नहीं रोकता। SARFAESI Act वह कानून है जिसके तहत कर्जदाता अदालत गए बिना गिरवी संपत्ति पर कार्रवाई कर सकते हैं।

क्या हुआ

फैसले के अनुसार, कर्जदारों ने बैंक से लोन लिया, संपत्तियां गिरवी रखीं और भुगतान में चूक की, जिसके बाद बैंक ने SARFAESI कार्यवाही शुरू की। कर्जदारों ने 2 मार्च 2024 के एक आदेश को पहले की एक रिट याचिका में चुनौती दी थी, जिसमें बैंक का नाम Aryavart Gramin Bank था। उस याचिका में नोटिस जारी हुए, लेकिन कोई अंतरिम राहत नहीं मिली और वह लंबित रही।

इसके बाद कर्जदारों ने 7 सितंबर 2026 के बिक्री नोटिस को चुनौती दी। उनकी दलील थी कि पहली याचिका और SARFAESI कार्रवाई लंबित रहते हुए बैंक Recovery of Debts and Bankruptcy Act, 1993 के तहत डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल में मूल आवेदन दायर नहीं कर सकता था, इसलिए उससे जारी वसूली प्रमाणपत्र और बिक्री नोटिस रद्द होने चाहिए।

अदालत ने कहा कि बैंक को 1993 के कानून की Section 19 के तहत कार्यवाही शुरू करने से रोकने वाला कोई प्रावधान नहीं है। अदालत ने ध्यान दिया कि ट्रिब्यूनल फैसला दे चुका है, जिसे कर्जदारों ने चुनौती नहीं दी। चूंकि कर्जदारों के पास उस फैसले के खिलाफ पर्याप्त वैधानिक उपाय है, अदालत ने रिट याचिका पर सुनवाई से इनकार करते हुए उसे खारिज कर दिया। अदालत ने 2024 की पुरानी याचिका को अलग कर उपयुक्त पीठ के सामने रखने का आदेश दिया।

इसका क्या मतलब है

कर्जदारों के लिए यह फैसला बताता है कि इस मामले में बिना अंतरिम आदेश वाली लंबित रिट याचिका ने बैंक को डेट्स रिकवरी ट्रिब्यूनल जाने से नहीं रोका। अदालत ने कहा कि ट्रिब्यूनल के फैसले को चुनौती 1993 के कानून के तहत अपील या अन्य उपाय से ही दी जानी चाहिए।

अदालत ने साफ किया कि उसने याचिका केवल इसलिए खारिज की क्योंकि वैधानिक उपाय उपलब्ध है, और मामले के गुण-दोष की जांच नहीं की। अगर कर्जदार उस उपाय का सहारा लेते हैं, तो उस पर उसके अपने गुण-दोष के आधार पर विचार होगा।

स्रोत: High Court judgment

यह समाचार सार्वजनिक रूप से उपलब्ध आधिकारिक जानकारी पर आधारित है और केवल जानकारी के लिए है। यह निवेश या वित्तीय सलाह नहीं है।